कहा जाता है कि शतरंज का खेल मूलतः भारत से शुरू होकर अरब होते हुए यूरोप गया और फिर पूरे संसार में लोकप्रिय और प्रसिद्ध हो गया। लेकिन वास्तविक में शतरंज को भारत और विश्वस्तर पर पहचान दिलाने का श्रेय मैनुअल आरोन को जाता है। जिन्होंने विश्व-शतरंज में भारत की उभरती हुई शक्ति का अहसास कराने में मुख्य भूमिका निभाई। 

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Credit : Facebook (Gaurab Chakarborty)

देश के पहले शतरंज मास्टर मैनुअल आरोन का जन्म 30 दिसंबर 1935 में बर्मा (वर्तमान म्यांमार) में हुआ था। उनके माता-पिता भारतीय थे। और तमिलनाडु से उन्होंने अपनी शुरुआती पढ़ाई पूर्ण की। मैनुअल ने 8 साल की उम्र में शतरंज खेलना शुरू कर दिया था। अपनी बड़ी बहन से इस खेल की तकनीक सीखी और शतरंज में महारत हासिल की। 

इलाहाबाद विश्वविद्यालय में बी.एस.सी के अध्ययन के दौरान उन्होंने अपनी जीवन की पहली शतरंज प्रतियोगिता खेली और इसके बाद उन्होंने कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा। 50 के दशक के मध्य से 70 के दशक के अन्त तक मैनुअल आरोन का नाम ही छाया रहा। वह वर्ष 1959 से 1981 तक के बीच की अवधि में 9 बार राष्ट्रीय चैंपियन रह चुके हैं। साथ ही उन्होंने तमिलनाडु में 11 बार राज्य की चैंपियनपशिप जीती।

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Credit : Facebook (Gaurab Chakarborty)

1961 में एशियाई-आस्ट्रेलिया जोनल फाइनल में मैनुअल आरोन ने आस्ट्रेलिया के सी.जे.एस. पर्डी को 3-0 से हराया तथा वेस्ट एशियाई जोनल में मंगोलिया के सुकेन मोमो को 3-1 से हरा दिया। जिसके बाद वह इन्टरनेशनल मास्टर बन गए। यह शतरंज के खेल के शुरुआती दिनों की बात थी, जिस कारण आरनो की यह उपलब्धि देश के लिए बहुत गर्व की बात थी।

मैनुअल आरोन भारत के पहले शतरंज खिलाड़ी हैं जिन्हें अंतर्राष्ट्रीय मास्टर खिताब से नवाजा गया है। वे शतरंज के क्षेत्र में अर्जुन पुरस्कार हासिल करने वाले पहले खिलाड़ी हैं। साथ ही आरोन लगातार पांच वर्ष राष्ट्रीय चैंपियन रहने वाले इकलौते शतरंज खिलाड़ी हैं। उन्होंने अपने बेहतरीन खेल प्रदर्शन से अन्तरराष्ट्रीय स्तर पर अपनी पहचान बनायी। 

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मैनुअल आरोन तमिलनाडु चैस एसोसिएशन के सेक्रेटरी रह चुके हैं और ऑल इंडिया चैस फेडरेशन के चेयरमैन के तौर पर अपनी सेवाएं भी दे चुके हैं। उनके बाद 1978 में वी. रवि इंटरनेशनल मास्टर बननेवाले दूसरे भारतीय थे। वहीं इसके दस साल बाद 1988 में भारत को विश्वनाथन आनंद के रूप में पहला ग्रैंड मास्टर मिला। 

मैनुअल आरोन ने भारतीय शतरंज के परिदृश्य पर वर्षों तक प्रभुत्व बनाए रखा और अन्तरराष्ट्रीय स्तर पर भारत की इस क्षेत्र में उभरती शक्ति का अहसास कराया। साथ ही विश्वस्तर पर भारतीय शतरंज खिलाड़ियों को अपनी पहचान बनाने के लिए उनकी राह को आसान बनाया । 

 

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