किसी भी शहर को स्वच्छ बनाए रखने में उस शहर के लोगों के साथ-साथ शहर भर में लगे कूड़ेदान की भी मुख्य भूमिका होती है। हालांकि, बदलते समय के साथ कूड़ेदान का प्रारूप भी बदला है। अब कूड़ेदान न सिर्फ पर्यावरण को प्रदूषण से बचाने में मददगार साबित हो रहे हैं, बल्कि करोड़ों रुपये भी बचा रहे हैं। और वो कैसे, चलिए जानते हैं…

दी बेटर इंडिया के अनुसार, पिछले साल मुंबई के अंतरर्राष्ट्रीय हवाई अड्डे पर यात्रा खाद्य सेवाओं (Travel Food Services) के सीओओ और बिजनेस हेड “गौरव देवान” ने हवाई अड्डा परिसर में एक कूड़ेदान देखा, जिसमें से कचरा बाहर गिर रहा था। सफ़र करने में अब भी कुछ समय था इसलिए उन्होंने दस्ताना पहना और यह पता लगाने के लिए कि ऐसा क्यों हो रहा है उन्होंने कूड़ेदान छान मारा।

विस्तृत जांच करने के बाद उन्होंने तीन दिवसीय सर्वेक्षण का आदेश दिया और पता चला कि भोजन के साथ यात्रियों की समस्या स्वाद के बारे में नहीं बल्कि भोजन की मात्रा के कारण थी।

इस खोज के बाद से अब तक करीब ₹1.2 करोड़ बचाया जा सका है। इसके तहत डेजर्ट सेक्शन में कुछ बदलाव किया गया है। इस तरह न सिर्फ खाने की बर्बादी में कमी आई बल्कि यात्रियों के पैसे भी बर्बाद होने से बच रहे हैं।

दी बेटर इंडिया ने टाइम्स ऑफ इंडिया का हवाला देते हुए कहा कि, दीवान की कंपनी ने इस साल अप्रैल माह में दिल्ली, मुंबई, कोलकाता और चेन्नई में अन्य हवाईअड्डा लाउंज समेत 19 शहरों में 280 खाद्य दुकानों में आयोजित तिमाही “डस्टबिन एनालिसिस” की सदस्यता ली है। “डस्टबिन एनालिसिस” यात्रियों के खाने का विश्लेषण करेगा।

टाइम्स ऑफ इंडिया से बात करते हुए देवान ने कहा कि जीवीके परिसर में स्थित कूड़ेदान मुश्किल से पूरी तरह से खत्म किए गए डेजर्ट से भरा हुआ था। पूर्व में हम 15 तरह के डेजर्ट उपलब्ध कराते थे। कुछ लोग दो या तीन, यहां तक कि कुछ लोग चार भी लेते थे। लेकिन वे लोग मुश्किल से एक चम्मच ही खाते थे और बाकी का सब कूड़ेदान में डाल देते थे।

देवान ने आगे कहा “लेकिन अब हम 18 तरह के डेजर्ट उपलब्ध कराते हैं लेकिन बहुत ही कम तादाद में। इस तरह परिसर में कूड़ा कम हो गया है। इस तरह मुंबई एयरपोर्ट परिसर में हम सालाना ₹1.2 करोड़ बचा पा रहे हैं। कूड़ेदान के माध्यम से हमें जानकारी प्राप्त हुई कि लोग किस तरह की चीजें खाना पसंद करते हैं। यही नहीं, कूड़ेदान ने हमें इस बात की भी जानकारी दी कि हम किस चीज़ का अत्यधिक मात्रा में उत्पादन कर रहे हैं।”

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