उर्दू के जाने-माने शायर मिर्ज़ा ग़ालिब अपनी शायरियों में ज़िंदगी को बखूबी दर्शाते थे। जिंदगी को देखने का ग़ालिब का अलग ही नज़रिया था, चंद अल्फाज़ों में वो जीवन के सुख-दुःख को बड़े ही सहजता से दर्शा देते थे। और शायद उसी को दर्शाते हुए ग़ालिब ने कहा है कि, “कैदे-हयात बंदे-.गम, अस्ल में दोनों एक हैं। मौत से पहले आदमी, .गम से निजात पाए क्यों”…अर्थात, जीवन का बंधन और गम, दोनों एक है। मौत से पहले गम से छुटकारा नहीं मिल सकता।

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Credit: India Today

हम सभी को को शेरों-शायरी का पिटारा देकर, फरवरी 15, 1869 को ग़लिब इस दुनिया से तो रुख़्सत हो गए, लेकिन उनके वो शेर आज भी लोगों के दिलों में ज़िंदा हैं। उस दौर के ग़लिब के वो शेर आज की परिस्थितियों को भी बखूबी दर्शाते हैं। ज़िंदगी के उतार-चढ़ाव को दर्शाते ग़ालिब के उन्हीं शेरों में से कुछ चुनिंदा शेर आज हम आपके समक्ष रख रहे हैं…

1. दुश्वर है काम का आसां होना!

बस-कि दुश्वार है हर काम का आसाँ होना,

आदमी को भी मयस्सर नहीं इंसाँ होना।।

2. कि हर ख़्वाहिश पे दम निकले!

हज़ारों ख़्वाहिशें ऐसी कि हर ख़्वाहिश पे दम निकले,

बहुत निकले मिरे अरमान लेकिन फिर भी कम निकले।।

3. बहुत बे-आबरू हो!

निकलना ख़ुल्द से आदम का सुनते आए हैं लेकिन
बहुत बे-आबरू हो कर तिरे कूचे से हम निकले

4. क़र्ज़ की पीते थे मय!

क़र्ज़ की पीते थे मय लेकिन समझते थे कि हाँ,

रंग लावेगी हमारी फ़ाक़ा-मस्ती एक दिन।।

5. लकीरों पर मत जा!

हाथों की लकीरों पर मत जा ए ग़ालिब,

नसीब उनके भी होते हैं जिनके हाथ नहीं होते।।

6. ख़ुदा भी पूछे बता तेरी रज़ा क्या है?

ख़ुदी को कर बुलंद इतना कि हर तक़दीर से पहले

ख़ुदा बंदे से ख़ुद पूछे बता तेरी रज़ा क्या है।।

7. घर में बहार आई!

उग रहा है दर-ओ -दीवार पे सब्ज़ा “ग़ालिब “

हम बयाबान में हैं और घर में बहार आई है

8. ख़ौफ होता है अंधेरो में!

कितना खौफ होता है शाम के अंधेरों में,
पूछ उन परिंदों से जिनके घर नहीं होते।।

9. मुश्किलें भी आसां हो गई!

रंज से खूंगर हुआ इंसां तो मिट जाता है ग़म,
मुश्किलें मुझपे पड़ीं इतनी कि आसां हो गईं।।

10. आह को चाहिए इक उम्र!

आह को चाहिए इक उम्र असर होते तक,
कौन जीता है तिरी ज़ुल्फ़ के सर होते तक ।।

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