सोमवार 17 दिसंबर को मुंबई में स्वीगी के लिए काम कर रहे डिलीवरी बॉय सिद्धू हुमानबाडे ने कुछ ऐसा देखा कि वह रुकने के लिए मजबूर हो गये। उन्होंने देखा कि एक अस्पताल में आग लगी है और लोग मदद के लिए चिल्ला रहे हैं। तब इस जांबाज़ लड़के ने लोगों को बचाने के लिए अपनी जान जोखिम में डाल दी और करीब दस लोगों का जीवन बचाया। 

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अपने कार्य के दौरान सिद्धू ने देखा कि अंधेरी(पूर्व) मरोल के ईएसआईसी कामगार हॉस्पिटल से धुआँ निकल रहा है और वहाँ फंसे लोग मदद के लिए चीख रहे हैं। लोगों की ये चीखें सिद्धू साफ़-साफ़ सुन सकते थे। और उन्हें यह समझते देर नहीं लगी कि अस्पताल में आग लग चुकी है। 

वह तुरंत समय बर्बाद न करते हुए अपनी मोटरसाइकिल छोड़कर लोगों की मदद के लिए दौड़ पड़े। जबकि अग्निशामक पहले से ही वहाँ पहुंच चुकी थी उन्होंने सीढ़ी की मदद से कई लोगों को बाहर निकाला लेकिन फिर भी काफी लोग अंदर फंसे हुए थे और मदद के लिए चिल्ला रहे थे। 

जिसके बाद सिद्धू ने मरीजों को बचाने के लिए अग्निशामक की सीढ़ी पर चढ़ना शुरू किया और पांच मंजिल तक चढ़ गए। तब उन्हें अहसास हुआ कि  अस्पताल की इमारत में तो बड़े गिलास लगे हुए हैं।  उन्होंने तुरंत एक बड़े से पत्थर की मदद से कांच के गिलास तोड़ दिए। और खिड़की के किनारे पहुँच कर लोगों को बचाने लगे। 

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वह बारी-बारी लोगों को अंदर से खींचकर सीढ़ियों के द्वारा बाहर निकाल रहे थे। लेकिन इस बचाव अभियान के दौरान दुर्भाग्यवश दो लोग नीचे गिर गए। तीसरी मंजिल पर किसी बुजुर्ग महिला को सीढ़ी से नीचे उतारते हुए वह महिला नीचे गिर गयीं। सिद्धू कहते हैं, “मैं कुछ भी नहीं कर सका क्योंकि वह महिला नीचे गिर गयी थी।”

अपनी सुरक्षा को पूरी तरह से अनदेखा कर इस बहादुर लड़के ने अग्निशामक के साथ मिलकर काम किया और धुएं में घिरे रहने के बावजूद करीब दस लोगों का जीवन बचाने में कामयाब रहे। वहाँ ऐसी स्थिति थी कि धुएं में सांस लेना भी मुश्किल हो रहा था। लेकिन फिर भी सिद्धू ने अपना जीवन जोखिम में डाल दिया। 

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बचाव अभियान के तीन घंटे बाद सिद्धू ने असुविद्या के संकेत देने शुरू कर दिये और उन्होंने छाती में दर्द की शिकायत की। उन्हें तुरंत उपचार के लिए पास के अस्पताल ले जाया गया और श्वास लेने में हो रही परेशानी का इलाज करावाया गया। इलाज के बाद डॉक्टरों ने उन्हें खतरे से बाहर बताया। 

इस युवा द्वारा प्रदर्शित बहादुरी सराहनीय है। हम उनकी मदद तो नहीं कर सकते लेकिन उनके साहस की प्रशंसा तो कर सकते हैं क्योंकि उन्होंने दूसरों का जीवन बचाने के लिए अपना जीवन जोखिम में डाला। सिद्धू कहते हैं, “हमें संकट में दूसरों की मदद करनी चाहिए, मदद करने के लिए डरने का कोई सवाल ही नहीं हैं।”

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