रविंद्रनाथ टैगोर एक विश्वविख्यात कवि, साहित्यकार और दार्शनिक थे। वे अकेले ऐसे भारतीय साहित्यकार हैं जिन्हें नोबेल पुरस्कार मिला है। वे नोबेल पुरस्कार पाने वाले प्रथम एशियाई और साहित्य में नोबेल पाने वाले पहले गैर यूरोपीय भी थे। वे दुनिया के अकेले ऐसे कवि हैं जिनकी रचनाएं दो देशों का राष्ट्रगान हैं—भारत का राष्ट्र-गान “जन गण मन” और बाँग्लादेश का राष्ट्रीय गान “आमार सोनार बांगला”। “गुरुदेव” के नाम से भी प्रसिद्ध रविंद्रनाथ टैगोर ने बांग्ला साहित्य और संगीत को एक नई दिशा दी थी।

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Credit: Hind Patrika

रविंद्रनाथ टैगोर का जन्म मई 7,1861 को कोलकाता में एक अमीर बंगाली परिवार में हुआ था। इनके पिता का नाम देवेंद्रनाथ टैगोर और माता का नाम शारदा देवी था। उन्हें प्रकृति से बहुत लगाव था। उनका मानना था कि विद्यार्थियों को प्राकृतिक माहौल में ही पढ़ाई करनी चाहिए। 1883 में मृणालिनी देवी के साथ उनका विवाह सम्पन्न हुआ था। उन्होंने अपनी पहली कविता 8 साल की छोटी सी आयु में हीं लिख डाली थी।

रवींद्रनाथ टैगोर ने कविताएं लिखने के साथ ही सफल जीवन जीने को लेकर भी कई विचार दिए हैं। आइए उनके कई ऐसे विचारों पर नज़र डालते हैं जो आपके जीवन में बड़ा परिवर्तन ला सकते हैं:

1. केवल खड़े होकर पानी को ताकते रहने से आप समुंद्र को पार नहीं कर सकते।

2. हमेशा तर्क करने वाला दिमाग धार वाला वह चाकू है जो प्रयोग करने वाले के हाथ से ही खून निकाल देता है।

3. किसी बच्चे की शिक्षा अपने ज्ञान तक सीमित मत रखिए क्योंकि वह किसी और समय में पैदा हुआ है।

4. जिस तरह घोंसला सोती हुई चिड़िया को आश्रय देता है उसी तरह मौन तुम्हारी वाणी को आश्रय देता है।

5. तर्कों की झड़ी, तर्कों की धूलि और अन्धबुद्धि। ये सब आकुल-व्याकुल होकर लौट जाती है किन्तु विश्वास तो अपने अन्दर ही निवास करता है, उसे किसी प्रकार का भय नहीं है।

6. बर्तन में रखा पानी हमेशा चमकता है और समुद्र का पानी हमेशा गहरे रंग (अस्पष्ट) का होता है। लघु सत्य के शब्द हमेशा स्पष्ट होते हैं, महान सत्य मौन रहता है।

7. बीज के ह्रदय में प्रतीक्षा करता हुआ विश्वास जीवन में एक महान आश्चर्य का वादा करता है, जिसे वह उसी समय सिद्ध नहीं कर सकता।

8. देश का जो आत्माभिमान, हमारी शक्ति को आगे बढ़ाता है, वह प्रशंसनीय है लेकिन जो आत्माभिमान हमें पीछे खींचता है, वह केवल खूंटे से बांधता है, यह धिक्कारनीय है।

9. चंद्रमा अपना प्रकाश संपूर्ण आकाश में फैलाता है परंतु अपना कलंक अपने ही पास रखता है।

10. मैंने स्वप्न देखा कि जीवन आनंद है। मैं जागा और पाया कि जीवन सेवा है। मैंने सेवा की और पाया कि सेवा में ही आनंद है।

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