भारतीय रूई बाजार में बीते हफ्ते ट्रकों की हड़ताल के कारण सुस्त कारोबार रहा। मगर इस हफ्ते तेजी रहने के आसार हैं क्योंकि जिनिंग मिलों की जोरदार मांग रहने की उम्मीद है।

वायदा कारोबार में भी रूई के दाम में मजबूती बनी रह सकती है। इसके अलावा अमेरिका में कपास की फसल सूखाग्रस्त होने से पिछले सप्ताह जो तेजी आई उससे भी सहारा मिलेगा।

हड़ताल टूटने के बाद शनिवार को वस्तुओं एवं सेवाओं का परिवहन दोबारा शुरू हुआ और इस सप्ताह सोमवार से ही कपास और रूई की मांग व आपूर्ति में इजाफा देखने को मिलेगा क्योंकि मिलों के पास कच्चे माल का अभाव है और उनकी खरीदारी जोरों पर होगी।

वहीं, स्टॉकिस्ट भी ऊँचे भाव पर अपना माल निकालना चाहेंगे। मगर कीमतों में कोई बड़ा उछाल आने की संभावना कम है क्योंकि कपास का रकबा लगातार बढ़ रहा है हालांकि पिछले साल से तुलना में अब तक करीब आठ फीसदी कम है।

चालू सीजन में 102.51 लाख हेक्टेयर में कपास की बुवाई हो चुकी है, जबकि पिछले साल की समान अवधि में देशभर में कपास का रकबा 111.51 लाख हेक्टेयर था। इस प्रकार कपास का रकबा पिछले साल के मुकाबले 7.96 फीसदी पिछड़ा हुआ है। इस तरह बुआई के रकबे में कमी का भी सपोर्ट मिलेगा।

इसके अलावा, विदेशी बाजार में लगातार कीमतों में सुधार का सिलसिला जारी है। आईसीई कॉटन फ्यूचर शुक्रवार को लगातार तीन दिन की तेजी को जारी रखते हुए पिछले सप्ताह के मुकाबले करीब एक फीसदी की बढ़त के साथ 88.34 सेंट प्रति पाउंड पर बंद हुआ। प्रमुख कपास उत्पादक क्षेत्र टेक्सास सूखे की चपेट में है और आगे और फसल कमजोर होने की रिपोर्ट आने की उम्मीद की जा रही है।

पिछले दिनों कॉटन में जो सीजन का सबसे ऊँचा स्तर देखने को मिला था वह भी अमेरिका में सूखा पड़ने की वजह से प्रेरित था। अगर वहां सूखे की स्थिति और गहराई तो कॉटन में दोबारा वही स्तर देखने को मिल सकता है। कारोबारियों ने बताया कि एक मात्र सूखे की वजह से इतनी बड़ी तेजी नहीं आएगी, मगर रूई की वैश्विक मांग में अगर तेजी आती है तो उससे ऊपर भी कीमत जा सकती है। अभी चीन की कोई बड़ी मांग नहीं है इसलिए बड़ी तेजी की संभावना कम है।

रूई बाजार के जानकार मुंबई के गिरीश काबड़ा ने कहा कि दरअसल विश्व व्यापार जंग की छाया बरकरार है और अमेरिका में कॉटन फैब्रिक उत्पाद पर अगर ट्रंप की नई योजना में आयात शुल्क लगाया जाता है तो रूई और कपास की कीमतों में दोबारा मंदी छा सकती है। चीन अगले साल भारत, आस्ट्रेलिया और अन्य देशों से ज्यादा रूई खरीद सकता है। ऐसे में भारतीय रूई के दाम में बड़ी गिरावट आने की संभावना कम है।

उन्होंने कहा, हाल में भी हमने देखा कि जब अंतर्राष्ट्रीय बाजार के दबाव में भारतीय वायदा बाजार में कॉटन के सौदे में बड़ी गिरावट दर्ज की गई थी उस समय भी हाजिर बाजार ठहरा हुआ था।

मौजूदा सीजन के आरंभ में गुजरात शंकर-6 कॉटन का निचला स्तर 30 नवंबर को 36,900 रुपये प्रति कैंडी था जो कि 14 जुलाई को 48,300 रुपये प्रति कैंडी तक उछला। इस प्रकार कीमतों में 11,000 रुपये प्रति कैंडी तक उठाव देखा गया है और अभी भी भाव 48,000 रुपये से ऊपर बना हुआ है। शनिवार को गुजरात में शंकर-6 (29 एमएम कॉटन) 48,100 रुपये प्रति क्विंटल था।

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