हम हमेशा से यही सुनते आ रहे हैं कि नारी शक्ति का रूप है। आज के समय में लगभग हर जगह चाहे वह गांव हो या शहर हर जगह महिला सशक्तिकरण पर चर्चा हो रही है लेकिन इसके वास्तविक मायने कितने लोग समझ पाते हैं यह कह पाना मुश्किल है।हमारे भारतीय समाज में महिलाओं की अवस्था में काफी सुधार हुआ है लेकिन जिस तरह के सुधार की कल्पना की जा रही थी वैसा सुधार नही हो पाया है। निस्संदेह हर रोज़ अलग-अलग भूमिकाएं निभाते हुई महिलाएँ किसी भी समाज का स्तम्भ होती हैं।लेकिन आज भी दुनिया के कई हिस्सों में समाज उनकी भूमिका को नजरअंदाज करता है। इसके चलते महिलाओं को बड़े पैमाने पर असमानता, उत्पीड़न, वित्तीय निर्भरता और अन्य सामाजिक बुराइयों के दुष्परिणाम को सहन करना पड़ता है।

Image result for महिला शोषण
Credit: MultiBriefs

 

आज हर क्षेत्र में पुरुष के साथ महिलाएं भी तमाम चुनौतियों से लड़ रही हैं, उनका सामना कर रही हैं, कई क्षेत्रों में तो महिलाएं पुरुषों से आगे भी हैं। इतिहास में ऐसी बहुत सी नारियाँ है जिन्होंने अपनी क्षमताओं से दुनिया को बहुत कुछ समझाया और सिखाया है। वे हम सब के लिए एक मिसाल कायम करके गई हैं। आज की नारी पढ़ी लिखी है और अगर वह चाहे तो अपनी क्षमताओं से क्या कुछ नहीं पा सकती? आज सबसे बड़ा सवाल यह है कि यदि देश की आधी आबादी को ऐसे ही अनदेखा किया जाएगा, उनका शोषण किया जाएगा, तो उनके बिना समाज का विकास कैसे संभव होगा? महिला और पुरुष दोनों ही समाज की धुरी होते हैं, किसी एक को कमज़ोर करके संतुलित विकास होना असंभव है। जब तक देश की आधी आबादी सशक्त नही होगी, हम विकास की कल्पना भी नही कर सकते।

Image result for महिला और पुरुष बराबर
Credit: The Meaningful Life Center

 

महिला सक्श्तिकरण की सही परिभाषा है महिलाओं के अंदर छोटे-बड़े हर काम का खुद निर्णय लेने की क्षमता का होना। अपनी निजी स्वतंत्रता और स्वयं फैसले लेने के लिए महिलाओं को अधिकार देना ही “महिला सशक्तिकरण” है। जब तक महिलाएँ अपने आप को पुरुषों से कमतर समझती रहेंगी और आत्म-निर्भर नहीं बनेंगी, तब तक बदलाव की कल्पना करना भी बेकार है। गावों के परिवेश में आज भी महिलाएँ अपनी आज़ादी,शक्ति और स्वाभिमान को अपने अंदर दबाकर पुरुषों द्वारा बनाए गए नियमों और कायदे-कानूनों को मानते हुए जीने पर मजबूर हैं। महिलाओं द्वारा अपना पक्ष रखा जाना या फ़िर अपनी आवाज़ उठाना ऐसे समाज में वर्जित है। इसका मूल कारण शिक्षा का अभाव भी हो सकता है। अशिक्षित होने के कारण महिलाओं को अपने अधिकार तक पता नहीं होते हैं। इसी कारण उनके आस-पास एक भ्रमजाल बना दिया जाता है और वे उसे ही सच मान लेती हैं।

Image result for अशिक्षित महिला शोषण
Credit: women womenia

शिक्षा जीवन में प्रगति लाने का एक शक्तिशाली उपकरण है। महिलाओं के उत्थान और सशक्तिकरण के लिए शिक्षा से बेहतर तरीका भला क्या हो सकता है? एक समय था जब महिलाओं को शिक्षा से वंचित रखा जाता था, मुख्यधारा से जुड़ने नहीं दिया जाता था और न ही कोई रोज़गार करने दिया जाता था। महिलाओं को आर्थिक रूप से सशक्त करने की सदा से ही उपेक्षा की जाती रही है और आर्थिक रूप से आत्म-निर्भर बनने के लिए उनका शिक्षित होना बहुत ही ज़रूरी है। महिलाओं को उनकी योग्यता और क्षमता के अनुसार विकास के अवसर प्रदान करना बहुत आवश्यक है और साथ ही महिलाओं के प्रति लोगों की सोच में बदलाव लाए जाने की भी आवश्यकता है। महिलाओं को भी अपने अधिकारों के लिए आगे आना होगा और अपनी कार्यक्षमता से अपनी शक्ति का और स्वयं के सशक्त होने का परिचय देना होगा।

Image result for महिला शिक्षा के काल्पनिक चित्र
Credit: RSSing.com

महिलाओं को स्वयं आगे बढ़कर अपने प्रति हो रहे आर्थिक और शारीरिक शोषण के खिलाफ आवाज़ उठानी होगी। भारतीय समाज में हमेशा से ही पुरुषों का प्रभुत्व रहा है जहाँ महिलाओं को प्राचीन काल से ही अलग-अलग तरह की हिंसा का शिकार होना पड़ा है। एक तरफ तकनीकी क्षेत्र में लगातार प्रगति हो रही है और खुशहाली का स्तर बढ़ रहा है तो दूसरी तरफ महिलाओं के प्रति बलात्कार और दुर्व्यवहार में भी वृद्धि हुई है। अब समय आ गया है कि महिलाएं अपने आत्म-बल को पहचानें और पुरुषों द्वारा किए जा रहे इस अत्याचार का डटकर सामना करें। नारी शक्ति का दूसरा रूप है।ज़रुरत केवल उस शक्ति को पहचानकर आगे बढ़ने की है ताकि वह समाज में सिर उठाकर चल सके। समाज के सभी बन्धनों से स्वयं को आज़ाद कर इतना सशक्त होने की ज़रुरत है जिससे कोई भी उसकी ओर बुरी नज़र से देखने की हिम्मत तक न कर सके। महिलाओं पर होने वाले दुष्कर्म जैसे अपराध को रोकने के लिए उन्हें अपनी और समाज की सोच को बदलना होगा और इस तरह के जुर्म को रोकने के लिए आरोपियों के खिलाफ अपनी आवाज को बुलंद करना होगा।

Related image
Credit: huffingtonpost.com

 

इन सब अपराधों के बढ़ने का एक कारण यह भी है कि महिलाएँ स्वयं का ही अस्तित्व समाप्त कर, स्वयं ही समाज को पुरुष प्रधान बनाती आई हैं। क्यों वे लड़के को अपनी कोख से जन्म देने के बाद लड़की के समरूप नहीं पालती? क्यों लड़कों को जन्म से ही उच्च स्थान दिया जाता है? क्यों बहू को बेटी के जन्म देने पर कोसा जाता है? क्यों स्वयं एक स्त्री होने के बावजूद बेटे के जन्म को प्राथमिकता देती हैं? जिस दिन महिलाओं ने महिलाओं को समझना, उनकी सराहना करना और आगे बढ़ने की हिम्मत देना आदि की शुरूआत कर दी, उसी दिन से पुरुष सत्तात्मक समाज में वे अपनी पहचान स्थापित करने में कामयाब हो जाएंगी।

Image result for महिला एकता चित्र
Credit: HindiKiDuniya.com

हमें केवल पुरुषों की सोच में ही नहीं बल्कि अपनी सोच में ही बदलाव लाना पड़ेगा। नारी मनुष्य जाति का एक अभिन्न हिस्सा है। नारी को परम्पराओं और रीति-रिवाज़ों की ज़ंजीरों में बांधकर रखने से नारी-जाति और समाज की हानि तो है ही लेकिन पुरुष वर्ग भी इस हानि से बच नहीं पाएगा। क्योंकि किसी भी स्वस्थ समाज की नींव तभी रखी जा सकती है जब नारी और पुरुष दोनों को बराबरी का दर्ज़ा मिले। जिस दिन महिला और पुरुष के बीच का भेद-भाव खत्म हो जाएगा उस दिन हमारे समाज में एक नए युग का आरम्भ हो जाएगा।

Image result for नारी सशक्तिकरण
Credit: www.hindikunj.com

Share

वीडियो

Ad will display in 10 seconds