एनटीडी इंडिया आपके लिए मुंबई के रचनात्मक क्षेत्र के एक पूर्व विज्ञापन पेशेवर सुरेन राव के साथ एक विशेष साक्षात्कार लेकर आया है। वर्तमान में, कोलकाता में स्थित एक स्वतंत्र लेखक के रूप में काम करते हुए राव फालुन दाफा (जिसे फालुन गोंग भी कहा जाता है) के प्राचीन आध्यात्मिक अभ्यास के अनुयायी हैं और इस स्वयं-सुधार प्रणाली को बढ़ावा देने में सक्रिय रूप से शामिल है।

व्यापक रूप से इस निजी वार्तालाप में, राव, जो फालुन दाफा एसोसिएशन ऑफ इंडिया के अध्यक्ष हैं, साझा करते हैं कि भारतीयों ने पिछले दो दशकों में इस अनूठे अभ्यास और शिक्षाओं को कैसे अपना लिया है, और चीन में फालुन दाफा अभ्यासिओं के दमन को उजागर करते हैं।

एनटीडी इंडिया : भारत के फालुन दाफा एसोसिएशन के अध्यक्ष होने के नाते, आप के विचार से, भारत जो स्वयं एक समृद्ध सांस्कृतिक और पारंपरिक विरासत वाला देश है, के लिए यह प्राचीन आध्यात्मिक प्रणाली कितनी महत्वपूर्ण है?

सुरेन राव : मेरे व्यक्तिगत अनुभव से बात करते हुए, मैं एक दशक से भी अधिक समय से उच्च स्तर के योग का अभ्यास कर रहा था। इससे मुझे स्वास्थ्य और फिटनेस स्तर पर मदद मिली, लेकिन … बिना किसी तुलना किए, मैं कहूंगा कि फालुन दाफा ने मुझे जीवन के एक ऐसे तरीके को अपनाने में मदद की जो हर पल हमें सचेत करता है, जिससे आप सत्य, करुणा और सहनशीलता के सार्वभौमिक सिद्धांतों के साथ स्वयं को संरेखित करने का प्रयास करते हैं। इससे यह होता है कि आपके हर विचार, वाणी और क्रिया पर इन सार्वभौमिक सिद्धांतों के आधार पर निर्णय लेना आपका प्राकृतिक स्वभाव बन जाता है।

फालुन दाफा एक ऐसा साधना अभ्यास है जो आपको सभी नकारात्मकताओं से छुटकारा पाने, और सभी परिस्थितियों में, अच्छी या बुरी, अपनी भलाई और संतुलन बनाए रखने को सिखाता है। मुझे लगता है कि, कोई भी समाज या देश जो मुक्त विचारों वाला है और कट्टर राष्ट्रवादी नहीं है, इस प्राचीन अभ्यास को आसानी से अपना सकता है। फालुन दाफा समाज की नैतिक प्रकृति और अपने लोगों के लिए जीवन की बेहतर गुणवत्ता में सकारात्मक बदलाव ला सकता है।

एनटीडी इंडिया : यह दिलचस्प बात है कि भारत में कई लोग इस आध्यात्मिक प्रणाली में रूचि दिखा रहे हैं। क्या आप हमें बता सकते हैं कि भारत में इस अभ्यास को प्रस्तावित कैसे किया गया था?

सुरेन राव : वर्ष 2000 में, स्वीडन, फिनलैंड, ताइवान और संयुक्त राज्य अमेरिका के फालुन दाफा अभ्यासी इस अभ्यास को बताने नई दिल्ली आये थे। मैंने एक पत्रिका में इसके बारे में पढ़ा था और उन्हें एक ईमेल लिखा था। वे मुंबई आए, और मैं 9 दिवसीय कार्यशाला में शामिल हो गया जहां उन्होंने हमें पांच अभ्यास सिखाए और फालुन दाफा के संस्थापक श्री ली होंगज़ी के वीडियो व्याख्यान दिखाए।

मैं वर्ष 2000 में फालुन दाफा व्यायाम और ध्यान अभ्यास सीखनेवाला भारत के पहले व्यक्तियों में से एक था, और तब से यह मेरे लिए जीवन जीने का एक तरीका बन गया है। धीरे-धीरे, फालुन दाफा ने बैंगलोर, हैदराबाद, नई दिल्ली, नागपुर में अपनी उपस्थिति बनाई और छोटे शहरों में फैल गया।

मैंने योग और अन्य नए युग की प्रथाओं के वर्षों के अभ्यास के बाद अपने जीवन का मकसद पाया। क्योंकि मैंने फालुन दाफा से इतना कुछ पाया था, इसलिए मैं इसे समाज के साथ साझा करना चाहता था और चीन में अपने दुर्भाग्यपूर्ण साथी अभ्यासिओं के बारे में दुनिया को बताना चाहता था, जिनपर 19 सालों से क्रूरता से अत्याचार किये जा रहे हैं।

फालुन दाफा का 140 देशों में अभ्यास किया जा रहा और यह स्वैच्छिक एवं नि:शुल्क है। कोई विशिष्ट फॉर्म नहीं भरने हैं, कोई सदस्यता नहीं है, कोई फीस या दान शामिल नहीं है। फालुन दाफा किसी भी ऐसे व्यक्ति के लिए उपलब्ध है जो उच्च स्तर पर साधना अभ्यास करना चाहता है, चाहे वह अमीर हो या गरीब हो।

एनटीडी इंडिया : प्राचीन काल से कई आध्यात्मिक प्रणालियों ने ध्यान की शिक्षा दी है। आप इस विशेष अनुशासन का समर्थन क्यों करते हैं? इस अभ्यास की प्रमुख विशेषता क्या है?

सुरेन राव : मैंने बौद्ध और योग का ध्यान किया है। मुझे लगता है कि स्वयं के आचरण के बारे में स्थायी जागरूकता और शुद्ध चेतना फालुन दाफा की प्रमुख विशेषताओं में से एक है। यह हजारों अन्य ध्यान के रूपों के मुकाबले फालुन दाफा के सबसे बड़े फायदों में से एक है।

फालुन दाफा का अभ्यास आपके स्वयं के ह्रदय और मन की साधना पर केंद्रित है, इसलिए इसका लाभ आपके साथ रहेगा। मन की साधना के सिद्धांत में “मोहभावों को त्यागने” की प्रक्रिया शामिल है। मोहभाव भौतिक संपत्तियों के साथ लगाव या अत्याधिक चाह हो सकता है, या भावनाओं या एह्सासों के तले अभिभूत होना हो सकता है। मोहभावों, जैसे ईर्ष्या, क्रोध और भय को त्याग देना मन को अधिक उदार और करुणामय बना देता है। भावनाओं को त्यागने की प्रक्रिया कई स्तरों से गुज़रती है और नियमित सीखने की एक यात्रा है।

कुछ समय तक फालुन दाफा का अभ्यास करने के बाद, आप न केवल स्थिर और शांतिपूर्ण महसूस करेंगे, बल्कि समाज का हिस्सा होते हुए और दैनिक जीवन की आवश्यकताओं को पूरा करने के दौरान, जीने के लिए और जीवन में एक नया आयाम अनुभव करेंगे। पड़ोसियों, सहयोगियों, परिवार के सदस्यों आदि के साथ समाज में आपसी क्रियाओं के दौरान, एक अभ्यासी को ऐसी परिस्थितियाँ और अवसर प्रदान होते हैं जिससे वह मोहभावों को त्यागने और स्वयं के लाभ के बारे में कम सोचने की सीख पाता है। इस तरह, शरीर एक शांतिपूर्ण मंदिर की तरह बन जाता है और दैनिक जीवन जीते हुए भी वह एक उच्च क्षेत्र में साधना कर सकता है।

एनटीडी इंडिया : आप लगभग 18 वर्षों से फालुन दाफा का अभ्यास कर रहे हैं। क्या आप संक्षेप में बता सकते हैं कि इस अभ्यास ने आपको व्यक्तिगत रूप से कैसे मदद की?

सुरेन राव : मैं मास्टर ली होंगज़ी का बेहद ऋणी हूं। ऐसी कोई अन्य प्रणाली नहीं है जिसे मैं अपने जीवन की राह के रूप में अपना सकता हूँ। हालात या परिस्थिति या जो कुछ भी मेरा लोगों के साथ परस्पर सम्बन्ध होता है, यह मैं अपने आपको स्वाभाविक रूप से पूछता हूँ : क्या मैं खुद के साथ सच्चा हूं? क्या मैं सहिष्णु और दयालु हूं? इसलिए नहीं कि कोई मुझपर नज़र रख रहा है! इन मापदंडों के उपयोग से, कई संघर्षों को हल कर पाना सरल हो जाता है।

हाल के मेरे स्कूल पुनर्मिलन में, मैं अपने साथी विद्यार्थिओं से मिला, जो सभी अपने साठ के दशक में हैं और सभी मधुमेह, दृष्टि और दिल से संबंधित समस्याओं से पीड़ित हैं। उन्होंने मुझे बहुत ही शांत पाया और किसी ने कहा, “मैंने समय को रोक लिया हैं।” मुझे बहुत लोगों को बताने का मौका नहीं मिला, लेकिन मैंने अपने कुछ दोस्तों से कहा कि मैं फालुन दाफा का साधना अभ्यास करता हूँ और कैसे मेरी कितनी समस्याएँ जैसे साइनस से संबंधित सिरदर्द, स्पोंडिलोसिस और पुरानी पेट की समस्याएं बिना मुझे पता चले ही ख़त्म हो गईं।

अपनी उम्र के अधिकांश लोगों से विपरीत, जो कंप्यूटर और डिजिटल प्रौद्योगिकी से भयभीत हो जाते हैं, मैंने बहुत तेजी से सीख लिया और खुद को लेखन कार्य में संलग्न किया।

एनटीडी इंडिया : हमने भारत और विदेशों में स्कूल समुदायों के भीतर धीरे-धीरे “आध्यात्मिक मानसिकता” की प्रवृत्ति को घर करते देखा है। क्या आपको लगता है कि फालुन दाफा भारतीय संदर्भ में इस जरूरत को पूरा कर सकता है? हमारे सभी स्कूल अभी तक तकनीकी में इतने आगे नहीं पहुंचे हैं।

सुरेन राव : भारत में चारों ओर कई सौ स्कूलों में, फालुन दाफा के बारे में बताया गया है, और कई स्कूलों ने इसे अपने पाठ्यक्रम के हिस्से के रूप में शामिल किया है। कुछ हेडमास्टर्स ने साझा किया है कि कैसे हाइपर-एक्टिव बच्चे शांत हो गए हैं और अपने अध्ययन में बेहतर प्रदर्शन करते हैं। एक बार मिशनरी स्कूल के एक प्रिंसिपल ने मेरे साथ साझा किया कि फालुन दाफा अभ्यास छात्रों को स्वस्थ रहने में मदद करता है और छात्रों की स्कूल में अनुपस्थिति कम हो गयी है, और वे अधिक अनुशासित बन गए हैं।

मैंने ऐसे कई स्कूल देखे हैं जहां शिक्षक अभ्यास सीखने और फालुन दाफा की शिक्षाओं का अध्ययन करने में उत्साहित थे, छात्रों ने भी अभ्यास को तेजी से सीख लिया है और बड़ी लगन से अभ्यास करने लगे हैं। स्कूलों में, ज्यादातर फालुन दाफा एक प्रिंसिपल या शिक्षक से एक दूसरे को बताने से फैल गया है।

संयोग से, स्कूलों के अलावा, दिल्ली और हैदराबाद में पुलिस अकादमी द्वारा फालुन दाफा को अच्छी तरह से अपनाया गया था। कई बड़े संगठनों ने फालुन दाफा के अनुयायियों को उनके वरिष्ठ अधिकारियों को फालुन दाफा को परिचित कराने के लिए आमंत्रित किया था, और दिलचस्प रूप से जेल अधीक्षकों ने भी कैदियों को व्यायाम और ध्यान अभ्यास शुरू करने का अनुरोध किया है।

एनटीडी इंडिया : “सत्य-करुणा-सहनशीलता” यह तीन सुंदर सिद्धांत हैं, लेकिन यह समझ पाना अभी भी मुश्किल है कि चीन ने 1999 से इस प्रणाली को अवैध करार दिया है। क्यों?

सुरेन राव : सबसे पहले, हमें 1992 में परिचित कराने के बाद लोगों को फालुन दाफा से प्राप्त भारी लाभों के परिप्रेक्ष्य से देखना होगा।

1990 के उत्तरार्ध तक, 70 से 100 मिलियन लोग फालुन दाफा का अभ्यास कर रहे थे, जिसमें चीनी कम्युनिस्ट पार्टी (सीसीपी) और सेना के कई उच्च स्तरीय अधिकारी भी शामिल थे।

1998 में चीन में किए गए पांच स्वतंत्र स्वास्थ्य सर्वेक्षणों में फालुन दाफा के 35,000 अभ्यासिओं ने 60 प्रतिशत ने औसत इलाज दर, शारीरिक स्वास्थ्य में 80 प्रतिशत का सुधार दर और मानसिक स्वास्थ्य में 95 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की। इसलिए, सर्वेक्षणों से पता चलता है कि फालुन दाफा से रोग उपचार और स्वास्थ्य में स्पष्ट और महत्वपूर्ण प्रभाव पड़ता है।

सीसीपी के पूर्व प्रमुख, जियांग ज़ेमिन ने फालुन दाफा की भारी लोकप्रियता को बर्दाश्त नहीं कर पाने पर, जुलाई 20, 1999 को इस अभ्यास पर राष्ट्रव्यापी प्रतिबंध लगा दिया।

चीनी शासन द्वारा प्रतिबंधित, फालुन दाफा 140 से अधिक देशों में फैल गया है, जिसमें 100 मिलियन से अधिक लोग दुनिया भर में इसका अभ्यास कर रहे हैं। इस अभ्यास  के संस्थापक, श्री ली होंग्ज़ी को 2000 और 2001 में “नोबेल शांति पुरस्कार” और 2001 में “सखारोव पुरस्कार स्वतंत्र सोच के लिए” (Sakharov Prize For Freedom of Thought) के लिए नामित किया गया है।

कोई भी यह नहीं समझ सकता है कि कैसे जिस आध्यात्मिक अभ्यास ने चीनी कम्युनिस्ट शासन को भारी चिकित्सा खर्च से बचाया, जिसने लोगों के नैतिक मूल्यों को मज़बूत बनाया और उन्हें स्वस्थ और बेहतर इंसान बनाया, अचानक चीन में प्रतिबंधित किया जा सकता था। लेकिन, सच्चाई यह है कि चीनी कम्युनिस्ट पार्टी, जब से सत्ता में आई, वह हमेशा धर्म और विचारों की आज़ादी को दबा रहे हैं, ईसाइयों और तिब्बती भिक्षुओं को भी सताया जा रहा है।

एनटीडी इंडिया : चीन में चल रही क्रूरता के बारे में जागरूकता लाने के लिए भारतीय समुदाय ने क्या कदम उठाए हैं?

सुरेन राव : जो अभ्यास सीखने के लिए आते हैं उन लोगों को स्वयंसेवक चीन में फालुन दाफा अभ्यासिओं पर हो रहे उत्पीड़न के बारे सूचित करते हैं। यह ज्यादातर लोगों को भावुक कर देता है क्योंकि वे सभी विस्मित हो जाते हैं कि एक शांतिपूर्ण ध्यान अभ्यास को क्यों सताया जा रहा है।

बड़ी सभाओं में, पुस्तक मेले और त्योहारों में, स्वयंसेवक सूचना पत्रिका वितरित करते हैं और बैनर लगाते हैं। भारतीय फालुन दाफा अभ्यासिओं ने लोगों को सूचित करने और याचिकाओं पर हस्ताक्षर करने का अनुरोध करने के लिए हस्ताक्षर अभियान भी आयोजित किए हैं।

हमने पुरस्कार-विजेता वृत्तचित्रजैसे हार्ड टू बेलीव, ह्यूमन हार्वेस्ट एंड फ्री चाइना  भी विभिन्न भारतीय कॉलेजों, प्रेस क्लबों और सिनेमाघरों के ख़ास दर्शकों के लिए प्रदर्शित किए हैं, जो जीवित अंग प्रत्यारोपण और चीन में चल रहे उत्पीड़न का पर्दाफाश करते हैं।

एनटीडी इंडिया : क्या और कुछ है जिसे आप हमारे पढ़नेवालों तक पहुँचाना चाहते हैं?

सुरेन राव  : मैं इसे पूर्ण दृढ़ विश्वास के साथ कहूंगा : फालुन दाफा सबसे महान उपहारों में से एक है जो श्री ली होंगज़ी ने मानव जाति को दिया है। आप जितना अभ्यास करेंगे उतना ही उससे प्राप्त करेंगे।

मैं भारत में फालुन दाफा के कुछ यादृच्छिक अवलोकन करूंगा।

भारत में इतनी सारी प्रथाएं हैं और हर कोई अपनी ओर ध्यान खींचने के लिए उत्सुक है। बहुत से लोग एक अभ्यास से दूसरे अभ्यास को बदलते रहते हैं। मैंने यह भी देखा है कि ज्यादातर भारतीय अपने वर्षों-पुराने अनुष्ठानों और रीति-रिवाजों को नहीं छोड़ सकते हैं और जो थोड़ी सी पुरानी पीढ़ी है उनमें इस बात का प्रतिरोध है कि हम हमारी समृद्ध पारंपरिक प्रथाएं छोड़ कर किसी “विदेशी अभ्यास” को क्यों अपनाएं।

पिछले कुछ सालों में, मैंने देखा है कि क्योंकि सभी फालुन दाफा गतिविधियां स्वैच्छिक और नि:शुल्क हैं, इसलिए लोग इसे महत्व नहीं देते हैं और इसका मूल्य नहीं समझते हैं। जबकि वह अभ्यास जिसके लिए उन्हें भारी शुल्क अदा करना होता है वहां अपने पैसे का पूर्ण मूल्य प्राप्त करने के लिए समय पर पहुँच जाते हैं।

कईयों ने सुझाव दिया है कि हम कुछ शुल्क लगाया करें लेकिन हमारे मास्टर ली होंगज़ी ने जो हमें एक मुख्य दार्शनिक समझ दी है वह यह है कि यदि आप फालुन दाफा के लाभ और अच्छाई का अनुभव करते हैं तो आपको इसे समाज में जितने लोगों के साथ हो सके साझा करने का प्रयास करना चाहिए। मेरा मानना ​​है कि फालुन दाफा हमें अपने मानव जीवन के उद्देश्य की स्पष्ट समझ प्रदान कर सकता है और हमें सही राह बता सकता है।

मैं सचमुच यह चाहता हूं कि अधिक से अधिक लोग अपने लिए और मानव जाति के बेहतर भविष्य के लिए इस अद्भुत अभ्यास को अपनाएं। निरंतर अभ्यास के माध्यम से, फालुन दाफा एक व्यक्ति को परोपकारी, स्वस्थ और आंतरिक संतुलन की स्थिति तक पहुंचने में सक्षम बना सकता है।

मैं ताइवान के ऑर्थोपेडिक सर्जन डॉ. औ (Dr. Au) के एक विचार को साझा करना चाहता हूं, जिसने मुझे प्रभावित किया है। डॉ. औ, एक कुशल मार्शल आर्ट विशेषज्ञ और 15 वर्षों के ताई ची अभ्यासी, ने फालुन दाफा अपनाने के लिए सब कुछ छोड़ दिया। डॉ. औ के अनुसार, उन्होंने महसूस किया कि शरीर को बनाने और ऊर्जा को नियंत्रित करने के यह सभी प्रशिक्षण पैसे कमाने की तरह थे, केवल इस जीवनकाल तक ही सीमित।

डॉ.औ ने कहा, “आप मर जाएंगे और यह सब ख़त्म हो जाएगा। केवल फालुन दाफा आपके पिछले कर्म को हटाता है, वर्तमान के जीवन में आपके शरीर और मन को विकसित करने में सहायता करता है और भविष्य के जीवन में ज्ञानोदय की राह में आपकी मदद करता है।”

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