जब हम अपने शहरों में बैठकर “विकास” के नाम का फल चख रहे होते हैं, दूसरी ओर हमारी गांवों की स्थिति उनसे कई गुणा बुरी है। आधुनिक भारत से आशय सिर्फ शहरी आबादी से है लेकिन जब हम गाँव की ओर आते हैं तो पाते हैं कि यहाँ तो बिजली तक नहीं है। हालाँकि, अभी भी कुछ अच्छे लोग हैं जो समाज में बदलाव के लिए खुद आगे आते हैं, किसी के आगे आने का इन्तजार नहीं करते हैं। इन्हीं में से एक हैं ऋतू जैसवाल जिन्होंने अकेले बिहार के सिंघ्वाहिनी गाँव के विकास के लिए काम किया है।

Credit: Facebook | Ritu Jaiswal

पिछले कुछ वर्षों से ऋतू जैसवाल इस बदहाल और बाढ़ पीड़ित गाँव की तरक्की के लिए काम कर रही हैं। उनकी शादी अरुण कुमार से हुई है जो राजधानी दिल्ली में एक आईएएस अधिकारी हैं। 40 वर्षीय ऋतू दो बच्चों की माँ हैं, वे सिंघ्वाहिनी की तरक्की के लिए दिल्ली के आरामदेह जीवन को छोड़ गाँव में रहने लगी।

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बिहार के वैशाली में जन्मी ऋतू अपने युवा अवस्था से ही सामाजिक कार्यों के प्रति उत्साही थी। अपनी शादी के कुछ ही साल बाद जब उन्होंने अपने ससुराल की पैत्रिक गाँव सीतामढ़ी के सोन्बरशा ब्लॉक का दौरा किया तो वहां की स्थिति देख वे अत्यंत दुखी हो गई। वहां न तो बिजली थी, न अच्छी सड़क, न साफ़-सफाई और न ही पीने के लिए साफ़ पानी।

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इसके बाद वे नियमित रूप से इस गाँव में जाने लगी और सबसे पहले उन्होंने वहां की शिक्षा में सुधार पर काम करना शुरू किया। गाँव की एक युवा महिला अपनी बी.एड. की पढ़ाई पूरी करने के बाद बोकारो में नौकरी कर रही थी। ऋतू ने उनसे सिंघ्वाहिनी गाँव में पढ़ाने का आग्रह किया और उन्हें खुद के खर्च से हर महीने वेतन देने की बात कही। वे महिला इस काम के लिए तैयार हो गई और उन्होंने गाँव के उन 25 लड़कियों को पढ़ना शुरू किया जिन्होंने किसी कारणवश स्कूल जाना छोड़ दिया था। ऋतू की मेहनत रंग लायी और उस वर्ष 25 में से 12 लड़कियों ने अपनी मैट्रिक की परीक्षा 2015 फ्लाइंग कलर्स से पास की।

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इसके बाद ऋतू ने गाँव में लोगों से मिलना शुरू किया और उनसे खुले में शौच, घरेलू हिंसा, महिला शिशुहत्या और जैविक खेती जैसे मुद्दों पर बात करना शुरू किया। एक के बाद एक समस्या सुलझाने के बाद ऋतू अब अपने दिल्ली वाले घर से ज्यादा यहाँ समय बिताने लगी। यह निर्णय उन्होंने तब लिया जब उन्हें लगा कि गाँव को बदलने के अपने सपने को अगर उन्हें पूरा करना है तो उन्हें गाँव में ज्यादा से ज्यादा समय देना पड़ेग।

इस काम के लिए उन्हें अपने परिवार से भी पूरा समर्थन मिला और फिर वे गाँव चली गई। उनके परिवार के सदस्यों ने उन्हें कहा कि जब भी उन्हें समय मिलेगा वे उनके साथ गाँव में समय बिताने जरुर आया करेंगे। अपने परिवार के इन शब्दों से ऋतू को साहस मिला जिसकी उन्हें जरूरत थी और इसी कारण वे गाँव में रहने जैसा बड़ा फैसला ले पाने में सक्षम हो पाई।

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वर्ष 2016 में, सिंघ्वाहिनी गाँव के लोगों ने उनसे आग्रह किया कि वे गाँव के मुखिया के पद पर चुनाव लड़ें (पंचायत का मुखिया)। और उन्होंने ऐसा किया भी और वे इस चुनाव को एक बड़े अंतर के साथ जीती (उन्हें 72% वोट मिला)। चुनाव जितने के बाद ऋतू ने गाँव में सड़क बनवाने के लिए सरकारी अनुदान के लिए इंतजार करने के बजाये अपने पैसों से सड़क बनवाना शुरू किया। शुरुआत में उन्हें समस्याओं का सामना करना पड़ा लेकिन जब वहां के गाँव वालों ने उनके इस प्रयास को समझा तो उन्होंने अपनी जमीन का प्रयोग सड़क बनाने में करने दिया।

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ऋतू said, “अधिकारीयों ने कई बार मुझे हल्के में लिया लेकिन मेरी शिक्षा ने मुझे इन सबसे लड़ने की शक्ति दी। उदहारण के लिए, जब मैं बीडीओ के पीडीएस राशन कार्ड डाटा के एक्सेल के लिए बहस की तो उस वक्त उनका चेहरा देखने लायक था। मुझे जमीन के मालिकों से कई बार धमकी भरा फोन भी आया क्योंकि मैंने उनके यहां काम करने वाले मजदूरों को उनके अधिकार के बारे में बताया।”

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वास्तव में ऋतू को देखकर मन में एक सम्मान जाग उठता है कि कैसे एक महिला ने दिल्ली जैसे शहर की आरामदायक जिंदगी छोड़ गांव की भलाई के लिए वहां आकर रहने लगी। हम ऋतू के समाज के प्रति समर्पण और दृढ़ संकल्प को सलाम करते हैं। सच में, ऐसी महिलाऐं सम्मान की पात्र होती हैं।

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