संकट 2014 में शुरू हुआ जब फ्लिंट, मिशिगन शहर में पेयजल के जल स्रोत को ह्यूमन झील और डेट्रॉइट नदी से बदल कर फ्लिंट नदी को कर दिया गया जिसमें लेड की मात्रा उच्च स्तर पर थी । पानी में अनुचित लेड के कारण जीवन खतरे में था। नतीजन इसे पीने से पहले इसके हर बूँद को उबालना जरूरी था। जिससे 1,00,000 निवासी प्रभावितहो रहे थे और सारे नागरिकों को काफी परेशानी उठानी पड़ रही थी। 

Credit : Facebook

कोलोरोडो निवासी गीतांजलि राव उस वक्त मात्रा 9 वर्ष की थी। जब उन्होंने अपने माता-पिता को पानी में लेड का परीक्षण करते देखा। गीतांजलि को पता था लेड का परीक्षण करने की यह विधि काफी महँगी है और उन्हें लगा कि ये एक विश्वसनीय प्रक्रिया नहीं है जिसके परिणाम गलत भी हो सकते हैं इसलिए इसे बदलने के लिए गीतांजलि ने कुछ करने की ठानी। 

फ्लिंट की समस्या से गीतांजलि काफी प्रभावित हुई। और वह लोगों की मदद करना चाहती थी। उसका झुकाव हमेशा से ही विज्ञान की तरफ था। इसलिए गीतांजलि ने इस समस्या को चुनौती के रूप में लिया। वह पानी में लेड का पता लगाने के लिए कम लागत और आसान तरीका ईजाद करना चाहती थी। जिसके लिए उनके स्कूल के शिक्षकों ने भी उनकी मदद की। 

गीतांजलि को एक जरूरी बात ध्यान आई कि फ्लिंट इस समस्या का सामना करने वाला एकमात्र स्थान नहीं है, जरूर बाकी जलस्रोत भी प्रदूषित होंगे।उन्होंने रिसर्च की। गीतांजलि के मुताबिक, संयुक्त राज्य भर में करीब 5000 वॉटर सिस्टम हैं जो लेड से दूषित हैं। यह लेड युक्त पानी शरीर के लिए काफी घातक था। 

Gitanjali Rao
credit : Twitter

क्योंकि अगर आप लेड प्रदूषित पानी में नहाते हैं तो आपके बदन पर चकत्ते हो जाते हैं जिन्हें त्वचा रोग विशेषज्ञ तुरंत पहचान सकते हैं। और अगर कोई गर्भवती महिला लेड प्रदूषित पानी पी ले तो उनके बच्चों को शारीरिक रोग हो सकते हैं। इसलिए गीतांजलि ने गहन शोध और प्रयोग के माध्यम से पानी में लेड का पता लगाने के लिए कम लागत वाली सटीक विधि विकसित करने की अपनी यात्रा शुरू की। 

इस प्रयोग को करते वक्त गीतांजलि  को कई बार असफलता मिली। कई बार असफलता की वजह से गुस्सा भी आया लेकिन उसे पता था कि ये उसके  सीखने का ही वक्त है और ऐसे ही प्रयास करते-करते वह नया उपकरण तैयार कर सकती है। और कई कोशिशों के बाद वह अपने प्रयोग में सफल हो गयी। गीतांजलि के इस उपकरण से पानी में लेड का पता आसानी से लगाया जा सकता है।

गीतांजलि ने जो उपकरण बनाया है वह कॉर्बन नैनोट्यूब्स के ज़रिए पानी में लेड होने का पता लगाता है। इस उपकरण की सबसे अच्छी बात यह है कि इसे अपने स्मार्टफोन में एक ऐप से जोड़कर ही पानी में लेड यानी सीसा  धातु का पता लगाया जा सकता है। गीतांजलि ने उपकरण का नाम शुद्ध जल की ग्रीक देवी टेथीज़ के नाम पर रखा है।

d
Credit : steamschool

इसके बाद गीतांजलि ने डिस्कवरी एजुकेशन 3M साइंटिस्ट अवार्ड प्रतियोगिता के लिए अपने डिवाइस टेथीज़ का वीडियो भेजा। गीतांजलि इस प्रतियोगिता में विजेता रही। और अवॉर्ड के साथ 25 हज़ार डॉलर यानी ₹16.22 लाख रुपये की राशि भी उसने प्राप्त की। अब वह अपने डिवाइस टेथीज़ पर और काम करना चाहती है और उसे बाजार के लिए तैयार करने के लिए संशोधित करना चाहती है। 

लेड प्रदूषित पानी जैसे बड़े संकट से निपटने के लिए एक आसान, विश्वसनीय और कम लागत वाला उपकरण बनाकर गीतांजलि ने निःसंदेह यह साबित कर दिया है कि विज्ञान का भविष्य अच्छे हाथों में है। 

 

Share

वीडियो

Ad will display in 09 seconds