महाराष्ट्र, पुणे, खेद तालुका के उप कलेक्टर आयुष प्रसाद ने अपने अधिकार क्षेत्रों के गाँवों में कई समस्याएँ देखीं। गाँववासी सरकारी निधि द्वारा बनाये गए शौचालयों का उपयोग नहीं करते थे और खुले में शौच करना ज़्यादा पसंद करते थे। जिन लोगों ने शौचालय का उपयोग किया उनके गड्ढे भर गए और उनकी सफाई के लिए कोई नहीं था। आईएएस अधिकारी आयुष प्रसाद ने भरे हुए गड्डे की मिट्टी से खाद बनाने की युक्ति सोची जो इन गाँववालों की कमाई का जरिया बन गयी है। 

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गांँववाले शौच के लिए शौचालय का उपयोग न करते हुए खुले में जाते थे। लेकिन जो शौचालय का उपयोग करते थे उनके गड्डे भर जाते थे, जिसकी सफाई कोई नहीं करता था। शौच के गड्ढे में जमा सारी मिट्टी कचरे में चली जाती थी जो कि खाद बनाने के लिए काफी उपयोगी हो सकती थी क्योंकि इसमें उच्च पौष्टिक गुण होते हैं।

तब आईएएस अधिकारी आयुष प्रसाद ने इस समस्या से निपटने के लिए एक समाधान निकाला, जिससे गाँववाले शौच के इस कचरे का नियमित उपयोग करके अपनी आय का साधन निर्माण कर सकते थे। लेकिन यह इतना सरल नहीं था। प्रक्रिया बहुत लम्बी थी। फिर भी इस परियोजना को मूर्त रूप देने के लिए इस मिट्टी को परिक्षण के लिए इस साल की शुरुआत में प्याज और लहसुन अनुसंधान निदेशालय (डीओजीआर) में भेज दिया गया। 

मई तक इस मिट्टी के सकारात्मक परिणाम की जानकारी मिली। अनुसंधान में यह पाया गया कि यह मिट्टी उपयुक्त प्याज विकसित करने में सक्षम थी। इसके अलावा यह रासायनिक खाद से 9 प्रतिशत अधिक और जैविक खाद से 47 प्रतिशत ज्यादा उपज पैदा कर सकती थी। इसके बाद प्रसाद को महसूस हुआ कि इस मिट्टी का उपयोग व्यावसायिक रूप से किया जाए तो गाँववालों को आय प्राप्त हो सकती है और साथ ही उन्हें शौचालय का उपयोग करने के लिए प्रेरित भी किया जा सकता है। 

इन परीक्षणों की सफलता के बाद अगली चुनौती गाँववालों को अपना शौचालय साफ़ करने के लिए मनाने की थी इसके लिए उन्होंने आईएएस अधिकारी इंदिरा असवर और सोनाली अवचत की मदद ली। असवर ब्लॉक विकास अधिकारी हैं और महाराष्ट्र राज्य ग्रामीण जीवन मिशन (एमएसआरएलएम) की प्रमुखा भी हैं। वही अवचत भी एमएसआरएलए (MSRLM) की ब्लॉक समन्वयक हैं। 

सिविल सेविकाएं गाँववालों को अपना शौचालय साफ़ करने के लिए मनाने की कोशिश करने लगीं ताकि वे अपनी आय बढ़ा सकें। महिलाऐं आजीविका कमाने की इच्छुक थीं लेकिन अपशिष्ट को हाथ में लेने के विचार से उन्हें घिन महसूस हो रही थी। इसलिए आईएएस प्रसाद ने गाँववालों के सामने खुद अपने हाथों से उस गड्ढे से अपशिष्ट निकाला और लोगों को बताया कि जो अपशिष्ट वे निकाल रहे हैं वह चाय पॉवडर जैसे पदार्थ के अलावा और कुछ नहीं है। उन्होंने लोगों में विश्वास पैदा करने के लिए खुद अपने हाथों से गड्ढे को खाली किया। 

इस परियोजना की प्रमुखा दुर्गा नांगरे के अनुसार शुरू में इसके लिए सबने विरोध किया क्योंकि  उनका कहना था कि शौचालय साफ़ करना किसानों का काम नहीं है। लेकिन सरकारी अधिकारियों ने उन्हें संबोधित किया और इस काम के लिए प्रेरित किया। आज इन गाँववालों को पहला खाद का आर्डर बहुराष्ट्रीय कंपनी महिंद्रा एंड महिंद्रा जैसी कंपनी से मिला है जिसके कारण इन गाँववालों का मनोबल बढ़ा है।

Credit : Pune Mirror

शौचालय के प्रत्येक गड्ढे में से करीब 80 किलो खाद की मिट्टी निकलती है और गाँववाले इसे ₹20 प्रति किलो के दाम से बेचते हैं। खाद की मिट्टी गाँववालों की कमाई का ज़रिया बन गयी है तो अब गाँववाले खुले में शौच करने के बजाय शौचालय का उपयोग करते हैं। यह सब संभव हो पाया हैं आईएएस अधिकारी आयुष प्रसाद की अभिनव सोच के कारण। उन्होंने एक उदाहरण पेश किया है कि अभिनव सोच विकास और सशक्तिकरण का कारण बन सकती है। 

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