आज भी देश में ऐसे कई गांव हैं, जहां रात होते ही घुप्प अंधेरा छा जाता है। रोशनी के नाम पर यहां के लोगों को ढ़िबरी या फिर लालटेन का ही सहारा होता है और इसी के सहारे यहां रात के समय, नौनिहालों की पढ़ाई भी होती है। रोशनी के इस एक मात्र सहारे की वजह से कई बार दुर्घटनाएं भी हो जाती हैं और फिर यही चिराग़ लोगों की जिंदगी में कभी न खत्म होने वाला एक अंधेरा छोड़ जाता है…

एक ऐसी ही दुर्घटना ने ग्रामीण भारत को बिजली की रोशनी से रोशन करने वाले “हस्क पावर सिस्टम” का निर्माण करने की एक नई सोच दी। इसको विकसित करने के बाद, आज इस पावर सिस्टम की बदौलत बिहार और उत्तर प्रदेश के विभिन्न गांवों तक बिजली की रोशनी पहुंच रही है।

Credit: Huskpowersystem

हस्क पावर सिस्टम के सह-संस्थापक मनोज कुमार ने दी बेटर इंडिया से बात करते हुए कहा, “वर्ष 2007 में हस्क पावर सिस्टम की स्थापना की गई थी। जिसके बाद कंपनी ने बिहार और उत्तर प्रदेश में ग्रामीण उपभोक्ताओं को बिजली वितरण समाधान की पेशकश की।”

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उन्होंने बताया कि हस्क पहली ऐसी कंपनी है, जो बिजली बनाने के लिए धान की भूसी का इस्तेमाल 100 प्रतिशत बायोमास गैसिफिकेशन पद्दति से  करती है और इसके माध्यम से अपने ग्राहकों को 24/7 बिजली मुहैया कराती है।

प्रतिकात्मक तस्वीर

शुरुआत में 30 किलोवाट बायोमास गैसिफिकेशन यूनिट लगाया गया था, जिसकी मदद से 2 कि.मी. के दायरे में 300 परिवारों तक बिजली की रोशनी पहुंची। हालांकि, अब इसकी क्षमता बढ़ा दी गई है और इसकी मदद से 350 से भी अधिक गांवों के 12 हज़ार परिवार लाभान्वित हुए हैं।

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