2007 में अमृता खांडेराव यवतमाल जिले के नीलोना वन के पास एक छोटे से गांव भोस में रहने गए। उनका यह गांव पूरी तरह से घने जंगल की हरियाली से घिरा हुआ था। वहाँ सागौन के पेड़ इतने घने थे कि वहाँ से आकाश को देख पाना भी मुश्किल था । लेकिन इस हरियाली में वह खुद को काफी सुरक्षित और खुश महसूस करतीं थीं । 

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हालाँकि जैसे-जैसे समय बीतता गया व्यवसायिक परियोजना के कारण यहाँ की हरियाली कम होने लगी। और बड़े पैमाने पर जंगल की कटाई और आग की वजह से अमृता को काफी दुःख हुआ। क्योंकि अमृता इन पेड़ों को अपना दादा-दादी मानती थीं। और जब कोई इन पेड़ों को काटता था तब अमृता बहुत रोती थी। 

इसके बाद पेड़ों को बचाने के लिए अमृता ने कई नुक्कड़ नाटक और संगीत समारोह के माध्यम से लोगों को पेड़ों का महत्त्व बताया और उन्हें लगाने के लिए लोगों को प्रोत्साहित करने लगीं। लेकिन उनकी यह योजना भी काम नहीं कर रही थी। हालांकि पूरे समय उनका बेटा बोधिसत्व उनके साथ रहता था और वह अपनी माँ से काफी प्रभावित था। 

2013 में जब बोधिसत्व पहली कक्षा में था तब पहली बार उसने सार्वजनिक मंच पर वनों की कटाई के बारे में लोगों को बताया था। जिसके बाद अमृता ने सोचा कि उनका बेटा ही इस संरक्षण की मशाल को आगे ले जा सकता है। और बोधिसत्व की पेड़ों को बचाने की यह अविश्वसनीय यात्रा शुरू हो गयी। 

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इसके बाद बोधिसत्व ने अपना सन्देश फ़ैलाने के लिए विदर्भ के स्कूल, कॉलेज, स्वयं सहायता संस्थान, ग्राम पंचायत और यहाँ तक कि धार्मिक स्थलों का भी दौरा करना शुरू कर दिया। बोधिसत्व सिर्फ अपने शब्दों से ही नहीं बल्कि अभंगो के माध्यम से अपनी सुरीली प्रस्तुति देते हैं। और लोगों को पेड़ो के महत्त्व समझाते हुए उन्हें पेड़ लगाने के लिए प्रेरित करते हैं। 

हालाँकि स्कूल में एक विज्ञान प्रदर्शनी के दौरान सीड्स बॉल उनका उल्लेखनीय प्रदर्शन था जिसने इस पहल को उच्च स्तर तक पहुंचाया। अपनी यात्राओं के दौरान उन्होंने लोगों को बताया कि कोई भी सीड्स बॉल बना सकता है। साथ ही उन्होंने लोगें से अनुरोध किया कि वे फलों के बीजों को न फेंकें बल्कि उन्हें लगाएं। 

11 वर्षीय बोधिसत्व के दृढ़ समर्पण के कारण आज वह अपने क्षेत्र में सीड बॉय के नाम से जाने जाते हैं। और विदर्भ में उनका सीड बॉल मूवमेंट निश्चित रूप से अपनी आवाज़ उठा रहा है। लोग ग्लोबल वार्मिंग के गंभीर परिणामों के प्रति जागरूक हो रहे हैं। और वे जानते हैं कि इससे बचने के लिए सिर्फ पेड़ लगाना जरूरी है। 

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और पेड़ लगाने का सबसे आसान तरीका हैं सीड्स बॉल को एकत्रित करना। इन बीजों को सुखाने के बाद कहीं भी फेंक दो तो उसमें अपने आप पेड़ उग आते हैं। इस तरह से हम अपने जंगल को वापिस ला सकते हैं। बोधिसत्व के अथक प्रयासों का सार धीरे धीरे नजर आ रहा है। और उन्हें जिला कलेक्टर, मंत्री और विभिन्न लाभकारी संगठनों जैसी प्रतिष्ठित हस्तियों द्वारा सम्मानित किया जा चुका है। 

बोधिसत्व का पेड़ों के प्रति सन्देश देने का यह अभियान इतना प्रभावशाली रहा कि राज्य सरकार द्वारा 4 करोड़ वृक्षारोपण कार्यक्रम में पहला पौधा लगाने के लिए बोधिसत्व को आमंत्रित किया गया। अपने नाम के प्रति सच्चा रहते हुए एक बेहतर कल के लिए बोधिसत्व लोगों का मार्गदर्शन कर रहा है। और उसके अध्भुत मूल्यों और पर्यावरण के प्रति गहरी चेतना लाने के लिए उनकी माँ अमृता खांडेकर की सराहना करनी होगी। 

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