विश्व खाद्य दिवस और विश्व गरीबी उन्मूलन दिवस इस हफ्ते मनाया जा रहा है । लेकिन आज हम आपको ऐसे व्यक्ति के बारे में बताने जा रहे हैं जो कोट्ट्यायम गांव के लोगों के लिए एक आदर्श उदाहरण हैं और वह निराश लोगों के जीवन की गुणवत्ता को सुधारने का प्रयास  कर रहे हैं। और उन्हें अपने गांव में थॉमस चेतन के नाम से जाना जाता है। 

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69 वर्षीय पी यु थॉमस की दिनचर्या की शुरुआत बेहद व्यस्त तरीके से होती है। उन्हें सुबह एक कप चाय पीने का भी समय नहीं रहता। वह अपने नवजीवन ट्रस्ट के सदस्यों से मिलकर अपने दिन की शुरुआत करते हैं।  रोज करीब 200 लोगों के साथ बातें करना और उनको सुविधा उपलब्ध करवाना यह उनका रोज का काम है। और अब यह कार्य तो उनकी ख़ुशी का स्त्रोत ही बन गया है। 

करीब 40 साल पहले थॉमस पेप्टिक अल्सर जैसी बीमारी के शिकार हो गए थे। और कोट्टायम के एक अस्पताल के एक सामान्य वार्ड में करीब 22 दिनों तक इस बीमारी से जूझते रहे।तब उनके पास पैसे भी नहीं थे। इस दौरान उन्होंने अस्पताल में भोजन के लिए मरीजों को पैसे के लिए संघर्ष करते देखा। इस बात ने थॉमस के जीवन पर एक गहरा प्रभाव छोड़ा था। 

थॉमस जब 20 साल के थे तब उन्हें कोट्ट्याम मेडिकल कॉलेज के बॉयज हॉस्टल मे मेस में नौकरी लगी। तब उन्हें महीने में 151 तनख्वाह मिलती थी। इन पैसों में वह पांच रुपये गरीब मरीजों की दवाइयाँ खरीदने और कुछ ऐसे मरीजों के लिए भोजन खरीदने में खर्च कर देते थे जो खाना खरीद नहीं सकते। 

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उनकी इस दयालुता के कारण मेडिकल के छात्रों ने उन्हें सहयोग करना शुरू कर दिया। और आसपास के होटलों से भोजन एकत्रित कर गरीब मरीजों को देने लगे। कुछ सालों बाद थॉमस को मेडिकल कॉलेज में एक कर्मचारी के रूप में नियुक्त किया गया। जहां से उनका डॉक्टरों और मरीजों से जुड़ने का मार्ग प्रशस्त हो  गया। 

इसके बाद थॉमस ने 1970 में सूक्ष्म रूप खाद्य वितरण प्रणाली नवजीवन ट्रस्ट की शुरुआत की। जिसके बाद उनकी उदारता और दयालुता के किस्से अस्पताल के बाहर आसपास के गाँवो में भी फ़ैल गए।और आज कोट्टायम में रोज तीन अलग-अलग अस्पतालों के करीब 5000 गरीब मरीजों को घर का बना हुआ खाना खिलाया जाता है। साथ ही गर्मियों के दौरान यह ट्रस्ट अस्पतालों में उबला हुआ औषधीय पेयजल भी उपलब्ध करवाता हैं। 

इस ट्रस्ट का मुख्य उद्देश्य हमेशा बेघर और मानसिक रूप से बीमार लोगों का उपचार और पुनर्वास करना रहा है। इन जैसे लोगों को नवजीवन भवन लाकर दूसरे दिन अस्पताल भेज दिया जाता है। अधिकांश लोग पूर्ण तरह से ठीक होकर अपने घर चले जाते हैं। और जिनके पास घर नहीं होता वह स्वयसेवको के रूप में भवन में ही रहते हैं। 

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थॉमस बेघर हुए लोगों के रिश्तेदार को कभी नहीं ढूंढते बल्कि वह कहते हैं कि उन्हें एक और रिश्तेदार मिल गया है। वर्तमान में भारत के विभिन्न हिस्सों से करीब 200 लोग यहाँ अपना इलाज करा रहे हैं। नवजीवन भवन में आने के बाद करीब 4000 मरीज अपनी मानसिक स्थिति ठीक करा चुके हैं और इनमें  से कुछ तो यहीं स्वयंसेवक बनकर काम कर रह रहे हैं। 

ट्रस्ट ने मुफ्त एम्बुलेंस सेवा भी शुरू की है। ट्रस्ट चिकित्सा शिविर जैसे समारोह भी आयोजित करती रहती हैं। साथ ही ट्रस्ट के साथ रहनेवाले वंचित 100 परिवारों को हर सप्ताह मुफ्त चावल प्रदान किया जाता हैं। ट्रस्ट के माध्यम से थॉमस ने स्वच्छ और ग्रीन नामक एक पहल की शुरुआत की है जिससे अस्पतालों के परिसर को स्वच्छ और हराभरा किया जा सके। 

ट्रस्ट का सबसे महत्वपूर्ण मिशन है कि लोगों के बीच जागरूकता की भावना पैदा करना जिससे जरूरतमंद लोगों को सुविधा प्राप्त हो। इसके लिए उन्होंने करुणा का हाथ नाम की पहल की शुरुआत की जिसके लिए उन्होंने महाविद्यालयों का दौरा किया और विद्यार्थियों को प्रोत्साहित किया। वह अब तक करीब 1,20,000 को प्रोत्साहित कर चुके हैं। 

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इस कार्य में थॉमस की पत्नी और उनके पांच बच्चे मदद करते हैं। थॉमस कहते हैं सरकार और अन्य संस्थाओं से पैसे लेना हमेशा आसान होता है। लेकिन यह हमारे मिशन को कमजोर कर देती है इसलिए वह सिर्फ अपने शुभचिंतको से ही पैसे लेते हैं। आज ट्रस्ट का रोज का खर्च करीब 1 लाख आता है। 

थॉमस चेतन कोट्टायम के गांवों के लिए एक प्रेरणा बने हैं। और वह चाहते हैं कि ज्यादा से ज्यादा लोग इस कार्य से जुड़े। 

 

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