बंगलुरु के 10वीं कक्षा के दो छात्र प्रणय शिकारपुर और सिद्दार्थ विश्वनाथ ने प्रदूषित झीलों को बचाने के लिए एक ऐसे उपकरण का आविष्कार किया है जो झीलों के पानी की शुद्धता को नाप सकता है। 

Flobot Innovation by Bengaluru Students
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सबसे पहले इन दो छात्रों ने अपने शिक्षकों के माध्यम से बंगलुरु की झीलों की बिगड़ती दशा के बारे में जाना। कभी “झीलों के शहर” के नाम से जाने वाले बंगलुरु शहर की झीलें आज जल प्रदूषण के कारण खतरे में हैं। 1960 में यहाँ 262 झीलें हुआ करती थीं जिनकी संख्या घट के आज 81 ही रह गयी हैं और उनमें से भी मात्र 32 झीलों को जीवित माना जाता है। 

पेयजल की समस्या को दूर करने के लिए झीलों को साफ़ रखना जरूरी है, लेकिन इसके लिए लोगों में जागरूकता की कमी हैं। पर्यावरण प्रबंधन और नीति अनुसंधान संस्थान (EMPRI) द्वारा किए गए एक सर्वेक्षण में बेंगलुरु की 1518 जल निकायों को वर्गीकृत किया गया हैं जिसमें से 85% जल निकाय गंभीर रूप से प्रदूषित हैं। 

इसी बात को ध्यान में रखते हुए इन दो छात्रों ने एक प्रोटोटाइप पर काम करना शुरू किया जो आसानी से झीलों के घटकों का विश्लेषण कर सकता है। उन्होंने ब्रेडबोर्ड प्रोटोटाइप के साथ शुरुआत की जो झील-जैसी स्थिति में काम आ सके। उन्होंने विज्ञान मेले में भी इसका प्रदर्शन किया जहां उन्हें जबरदस्त प्रतिसाद मिला। 

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लेकिन इनके पास अभी भी उचित संसाधन उपलब्ध नहीं थे। तब उन्हें भारतीय विज्ञान संस्थान, बेंगलुरु के प्रोफेसर डॉ.टी.वी.रामचंद्र से मदद मिली। डॉ. रामचंद्र (IISc) के ऊर्जा और वेटलैंड्स रिसर्च ग्रुप का हिस्सा हैं। कई अनुसंधान समूहों में उनकी भागीदारी के माध्यम से शहर की झीलों और शहर के आसपास प्रदूषण को समझने में वे सबसे आगे हैं।

डॉ.रामचंद्र की मदद से यह छात्र एक सम्पूर्ण यन्त्र बनाने में कामयाब रहे और यहीं से फ्लोबोट 1.0 का जन्म हुआ। उन्होंने उसके ऊपर एक इलेक्ट्रिकल बॉक्स को बांधकर रखा था और वह विभिन्न सेंसर के साथ सुसज्जित था। 

इस उपकरण की सबसे अच्छी बात यह थी कि इसका एकत्रित डेटा एसएमएस के माध्यम से किसी को भी भेजा जा सकता था। उन्होंने एक ऐसा एप्प भी बनाया था जो रोबोट को वायरलेस रूप से नियंत्रित कर सकता था। 

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फ्लोबोट (FLoBoT) दुनिया का पहला मोबाइल डेटा अधिग्रहण मॉनीटर था जिसे किसी भी जल श्रोत में विद्युत चालकता, घुला हुआ ऑक्सीजन, pH, आदि जैसी जानकारी पाने के लिए उपयोग किया जा सकता था। इन सबके होते हुए भी, फ्लोबोट 1.0 में कुछ कमियाँ थीं। युवाओं ने कहा, “यह एक अडिग उपकरण था, जिसका वजन लगभग 16 किलोग्राम था।”

इसके अलावा यह उपकरण अपने आप चलने में सक्षम नहीं था, जिसका मतलब था कि इस उपकरण को नाव के माध्यम से झील में चारो ओर खींच कर ले जाना पड़ता था। छात्र एक ऐसा उपकरनण बनाना चाहते थे जो परिक्षण के लिए अनुकूल हो, और ज्यादा महंगा भी न हो। इस उपकरण को छोटा और दिखने में सुन्दर बनाने की ज़रुरत थी। 

इसलिए इन छात्रों ने लोगों के माध्यम से लगभग $3,500 का धन एकत्रित किया और उस पर काम करना शुरू कर दिया। इसके सुन्दर डिज़ाइन को किशोर बाबू ने बनाया जिसे फ्लोबोट 2.0 (FLoBot 2.0) नाम दिया गया। नया उपकरण पिछले उपकरण से काफी हल्का था और यह पानी में अपने आप चल भी सकता था। 

पहले उपकरण ने छह झीलों का परिक्षण किया था जबकि दूसरा उपकरण आठ झीलों का परिक्षण करने जा रहा था। इसमें हीट मैपिंग (heat mapping) की एक और नयी सुविधा भी जोड़ी गयी थी। जब इन छात्रों ने इस उपकरण का उपयोग किया तो झीलों की बेहद चौका देने वाली तस्वीरें सामने आयीं। 

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प्रणव कहते हैं कि कुछ झील संरक्षणवादी जिन्होंने उन्हें अपने प्रयोगों में भी मदद की, वे अपनी पूरी कोशिश कर रहे थे लेकिन प्रदूषण बढ़ते ही जा रहा था। एटीआरई जैसे संगठनों ने टीम को निर्देशित किया है और झीलों और जल निकायों को पुनर्जीवित करने में फ्लोबॉट का उपयोग किया है। इसका डेटा यह समझने में मदद करता है कि झीलों की सफाई की प्रक्रिया कहाँ से शुरू की जाए। 

फ्लोबॉट के साथ उनके नए विचार के लिए, दोनों को अशोक यूथ वेंचर (Ashoka Youth Venture) के लिए चुना गया था, जहां, प्रणव कहते हैं, वेंचर उन्हें विशेष कौशल प्रदान करने में मदद करेगा जो उन्हें चेंजमेकर के रूप में बढ़ावा देगा।

अब, टीम ने जल निकायों को संरक्षित करने के लिए समर्पित ‘टेस्टिंग वॉटर’ संगठन बनाया है। दोनों ने दिल्ली में आईआरआईएस साइंस फेयर (IRIS Science Fair) में भी हिस्सा लिया था और दूसरे स्थान पर पुरस्कार भी जीता।

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