विजेंद्र सिंह राठौर राजस्थान के अजमेर में एक ट्रेवल एजेंसी में कार्य करते हैं। एक ट्रेवल एजेंट होने के नाते वे हमेशा देश के विभिन्न जगहों की यात्रा करते हैं। लेकिन 2013 में उत्तराखंड की केदारनाथ की यात्रा ने उनके जीवन में एक अद्भुत बदलाव लाया  । 

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उस वर्ष विजेंद्र और उनकी पत्नी लीला ने चारधाम की यात्रा करने का फैसला किया। 30 यात्रियों के साथ यह जोड़ा अपनी चारधाम की यात्रा पर निकल पड़ा। ये दोनों अपनी इस यात्रा को सफलतापूर्वक पूरी करने की उम्मीद कर रहे थे। अपनी यात्रा के दौरान जब वे उत्तराखंड के लिए निकले तब उन्हें यह नहीं पता था कि एक विनाशकारी बाढ़ ने राज्य को प्रभावित किया हुआ है। 

ये लोग जब केदारनाथ में थे तभी 16 जून को पहाड़ पिघलकर ढह गया था। यह आपदा ऐसी थी जिससे कई लोगों ने अपनी जान गंवा दी और कई लोग अपनों से बिछड़ गए। इसी स्थिति में विजेंद्र की पत्नी लीला भी उनसे बिछड़ गयी। दुर्भाग्य से इन दोनों के पास एकदूसरे से संपर्क करने का कोई रास्ता नहीं था। बाढ़ प्रभावित क्षेत्रों में क्षतिग्रस्त सड़कों के कारण रास्ते बंद हो गए थे और वे खो गयी थीं। 

यह एक अपरिचित क्षेत्र था और लीला और विजेंद्र वहां किसी को नहीं जानते थे। लेकिन विजेंद्र प्रकृति के खिलाफ लड़ाई लड़े बिना हार नहीं मानने वाले थे। पानी का स्तर बढ़ने और इमारतों के ढहने के साथ साथ विजेंद्र ने लीला की खोज भी जारी रखी। विजेंद्र के पास लीला को खोजने के लिए एकमात्र साधन था, लीला की तस्वीर। वह इस तस्वीर को लोगों को दिखाते जिनसे भी मुलाकात करते और पूछते “क्या आपने मेरी पत्नी को कहीं देखा है?” 

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एक दिन सप्ताह में बदल गया और एक सप्ताह महीने में, लेकिन फिर भी लीला का कोई पता नहीं चल सका। लेकिन वह उम्मीद हारने वाले नहीं थे। विजेंद्र ने टाइम्स ऑफ़ इंडिया से बात करते हुए कहा ,”यहाँ तक कि मेरे परिवार के सदस्यों ने मुझे घर आने का आग्रह किया लेकिन मैं हार मानने वाला नहीं था। बहुत से लोगों ने सोचा कि मेरा दिमाग ठिकाने पर नहीं है।”

विजेंद्र को अपने बच्चों के पास भी जाना था, जो बड़ी ही उत्सुकता से अपने माता-पिता के लौटने का इंतज़ार कर रहे थे। लेकिन विजेंद्र कोई बुरी खबर लेकर अपने घर नहीं लौटना चाहते थे। विजेंद्र भावुक होकर कहते हैं, “जिस दिन से लीला गुम हो गयी मैंने उत्तराखंड कभी नहीं छोड़ा। उसे ढूंढने के लिए मैंने हज़ारों गांव छाने। मुझे भगवान और भाग्य पर पूरा विश्वास था कि मैं उससे फिर मिलूंगा,और वह ज़िन्दा है।”

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कुछ हफ्तों के बाद राज्य सरकार ने लीला को मृत घोषित कर दिया क्योंकि उनका पता नहीं लगाया जा सका था। हालाँकि विजेंद्र ने इस पर विश्वास करने से इंकार कर दिया और राज्य सरकार द्वारा दिए जा रहे 9 लाख के मुआवजे को लेने से इंकार कर दिया, जो मृतक के परिवार को दिए जा रहे थे।अगले 19 महीनो में विजेंद्र ने अपनी खोज और तेज कर दी। इस दौरान उन्होंने पत्नी को ढूंढंने के लिए और अपने बच्चों के भविष्य को सुरक्षित करने के लिए अपनी पैतृक संपत्ति भी बेच दी। 

एक साक्षत्कार के दौरान विजेंद्र ने कहा था, “उनके प्यार और विश्वास ने उन्हें आगे रखा।” उन्होंने बिना किसी आश्रय और भोजन के सड़को पर मुश्किल रातें बितायीं और सरकार द्वारा दिए मुआवजे को अस्वीकार कर दिया। लेकिन उनका यह समर्पित प्रयास व्यर्थ नहीं गया। जनवरी 27, 2015 को उत्तराखंड के गोंगली गांव के कुछ लोगें ने विजेंद्र को बताया कि एक महिला मानसिक रूप से अस्थिर हैं जो बिलकुल लीला जैसी दिखती हैं। 

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विजेंद्र ग्रामीणों की बात सुनकर उत्साहित हो गए और अपनी पत्नी को मिलने की चाह में ग्रामीणों के साथ चल पड़े। जब वह वहां पहुंचे तो उनकी ख़ुशी का ठिकाना नहीं रहा क्योंकि खुशकिस्मती से वह महिला सचमुच विजेंद्र की पत्नी लीला ही थी। लेकिन अफ़सोस की बात यह थी कि इस त्रासदी  का लीला के दिमाग पर बहुत गहरा आघात पंहुचा था और लीला की मानसिक स्थिति बिलकुल भी सही नहीं थी। लेकिन फिर भी विजेंद्र अपनी पत्नी को फिर से पाकर काफी खुश थे। 

विजेंद्र और उनका परिवार लीला को पुरानी स्थिति में लाने का पूर्ण प्रयास कर रहे हैं और अब उनमें थोड़ा सुधार भी हो रहा है। हालाँकि उनके साथ क्या हुआ इस बारे में कोई भी उनसे बात नहीं कर रहा है लेकिन उन्हें सामान्य बनाने और उनके चेहरे पर मुस्कान लाने के लिए विजेंद्र का परिवार विभिन्न कोशिशें कर रहा है। 

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केदारनाथ त्रासदी के बाद सरकार ने लीला को मृत घोषित किया लेकिन फिर भी विजेंद्र ने अपनी पत्नी को खोजने का निरंतर प्रयास जारी रखा। पारिवारिक पुर्नमिलन होने के तीन साल बाद हम आशा करते हैं कि लीला पहले जैसी हो जाए और हमेशा खुश रहे।

इस कहानी से प्रेरित होकर सिद्दार्थ रॉय कपूर ने इस कहानी के अधिकार हासिल कर लिए हैं और बहुत ही जल्द वह इस पर फिल्म बनाने वाले हैं। यह प्यार, समर्पण और दृढ़ता की कहानी है, जिसे दर्शक ज़रूर पसंद करेंगे।

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