कहते हैं, “इंसान को कभी भी हिम्मत नहीं हारनी चाहिए क्योंकि दुनिया में ऐसी कोई भी ऐसी चीज़ नहीं है जिसका समाधान ना हो।” बीमारियों का निदान उपचार में है, तनहाई का निदान अपनों के साथ में है, और अशांति और तनाव का निदान अध्यात्म में है। वियतनाम की एक लड़की जो कभी गंभीर बीमारी से जूझ रही थी और हर पल मौत के खौफ में जी रही थी, अध्यात्म ने उनके जीवन को पूरी तरह से बदल दिया।

“ऐसा महसूस हुआ जैसे बादलों की धुंध ने उनकी घायल आत्मा को अपनी लपेट में ले लिया हो, और उन्हें सहला रही हो।”

दांग थी नगुयेत (Dang Thi Nguyet) एक चीनी साधना अभ्यास के कारण अब पूरी तरह से एक गंभीर बीमारी से मुक्त है।

यह असाधारण कहानी मेरे बचपन की दोस्त नगुयेत (Nguyet) और उनके सुधार की है, जो एक गंभीर रुप से बीमार बच्ची से लेकर एक युवा महिला तक, निरंतर मौत के खौफ में जीती थी।

पहली बार जब मैने नगुयेत को दौरे से जूझते हुए देखा था, तो यह एक आपदा की तरह था जो आसमान से गिरा हो और उसे ज़मीन पर पटक दिया हो। वियतनाम में हाई स्कूल के अंतिम वर्ष में हम मुश्किल से 18 लोग थे, भविष्य के प्रति जोश से भरे हुए।

नेगुयेत हम में से सबसे तेज़ थी, और स्कूल में सभी कक्षाओं में मॉनिटर रही। उस सर्दी के दौरान पूरी कक्षा अंतिम परीक्षा की तय्यारी करने में और विश्वविद्यालय के प्रार्थना पत्रों में व्यस्त थी, और ऐसा लग रहा था जैसे वातावरण बेचैन ऊर्जाओं से गूंज रहा हो। उस वक्त हम सभी के लिए सबसे आरामदायक पल हमारे ब्रेक के समय छुपकर स्कूल की तीसरी मंज़िल की बालकनी पर जाकर गिरती हुई पत्तियों को देखना था।

एक दिन, ब्रेक के समय सभी के साथ बालकनी पर खड़े होने के दौरान, नगुयेत ने अचानक से अपने हाथ को कसकर पकड़ा और मदद के लिए पुकारती हुई कक्षा की ओर भागी। अचानक, वह ज़मीन पर गिर गई, और अचेतावस्था में जाने से पहले तेज़ी से कांपने लगी। वयस्कों ने तुरंत एंबुलेंस को बुलाया, और हमें बामुश्किल से प्रतिकृया देने का वक्त मिला। सदमें से उबरने के बाद, हम सभी उनके निर्जीव शरीर को दूर ले जाने की स्थिति को याद कर कांप जा रहे थे।

उसके बाद, नगुयेत लंबे समय के लिए स्कूल से छुट्टी पर चली गई। हम सभी जानते थे कि उनके लौटकर आने की ज्यादा उम्मीद नहीं है, हालांकि कोई भी इसे खुलकर नहीं कह रहा था।

शुरुआत में हम सभी के लिए अपने तेज़ और दयालु मित्र की कमी स्वीकार करना काफी मुश्किल था। हम सभी युवा थे और सपनों से भरे हए थे, फिर भी हम सभी को मृत्यु की सच्चाई स्वीकार करने के लिए मजबूर किया गया था। यहांं तक कि नगुयेत के पास विश्विविद्यालय आवेदन पत्र जमा करने का भी मौका नहीं था, और हाई स्कूल भी पास नहीं कर पाई—उनके सपने शुरु होने से पहले ही खत्म हो गए थे।

छः सालों का संघर्ष

नगुयेत से अस्पताल में मिलकर, मुझे उनकी विभिन्न बीमारियों के बारे में पता चला: एक बड़ा ब्रेन ट्यूमर, बाएं वेंट्रिकल से जुड़ा हुआ एक दुर्लभ हृदय विकृति जिस पर शल्यचिकित्सा करना बहुत ही ख़तरनाक होता है। ट्यूमर द्वारा दिमाग में नसों पर दबाव बनाए जाने के परिणास्वरूप अब उन्हें नियमित रुप से मरोड़ होता था। नगुयेत का ब्रेन ट्यूमर जन्मजात है; यह उनके जन्म से ही छिपा हुआ था, वर्षों तक धीरे-धीरे बढ़ रहा था। इसी वजह से मैं अक्सर उनमें सिर दर्द, चक्कर आना और हाथों के सुन्न होने की समस्याओं को देखती थी। कभी-कभी मैं देखती कि वह चुपचाप सबकुछ सहती थी क्योंकि वह नहीं चाहती थी कि हम उन्हें लेकर चिंतित हों और उन पर दया दिखाएं।

इन उदास परिस्थितियों के बावजूद, नगुयेत को एक उम्मीद थी कि उनकी बीमारी ठीक हो जाएगी और वह अपने दोस्तों के साथ स्कूल जा पाएगी। दुर्भाग्य से, उनकी उम्मीद खत्म हो गई जब उन्होने चिकित्सक द्वारा निदान के बारे में सुना। उन्होंने कहा कि सर्जरी बहुत ही खतरनाक है, इतना कि कोई भी चिकित्सक इसे करने की हिम्मत नहीं करता—मौत का खतरा या निष्क्रिय बनने का खतरा बहुत ही ज्यादा था।

नगुयेत ने बाद में मुझे बताया कि जब चिकित्सक ने उनके इलाज के बारे में बताया तो वह अपने आसुंओं को नहीं रोक सकी, क्योंकि अचानक से आए निराशा का बोझ अथाह था। यहां तक कि शीर्ष विशेषज्ञ भी डॉक्टर की बात से सहमत थे: वह बस इतना कर सकती है कि, घर जाए, बिस्तर पर रहे, और मरोड़ से बचने के लिए दवाइयां लेती रहे।

जब वह घर पहुंची, तो उन्होंने एक तरह के आध्यात्मिक संकट में प्रवेश किया। सबसे बुरा हिस्सा डर था। वह हर चीज़ से डर रही थी, खासकर दौरे से। इसिलिए उन्होने कभी भी कुछ करने की हिम्मत नहीं की और कभी भी घर से बाहर नहीं निकली, यहां तक की मकान के पीछे आंगन में भी नहीं जाती। कहीं उन्हें मरोड़ ना शुरु हो जाए, इस डर से उनके परिजनों में से किसी एक को उनके साथ हमेशा रहना होता था।

जब उनको दौरा पड़ता था, तब वह बहुत ही ज्यादा डर की स्थिति में चली जाती थी। उनके परिजन उनके मुंह में तौली लगाते थे ताकि उनकी जीभ ना कटे। उन्होने कहा कि दौरे के दौरान शुरुआती कुछ मिनट में ऐसा लगता है जैसे वह मर रही हो और पूरी तरह से असहाय हो। उसके बाद कुछ घंटो के लिए वह बेहोश हो जाती है, लेकिन जब वह उठती है तो वह हमेशा ज़िंदा बच निकलने के लिए निराशा महसूस करती है। दौरे के बाद, उनके पूरे शरीर में दर्द होता था, और उन्हें लंबे समय के लिए सोना पड़ता था।

धीरे-धीरे, मैने देखा नगुयेत एक युवा, आश्वस्त, और ऊर्जावान व्यक्ति से निराशा और भयभीत बड़े बच्चे के रुप में पतित हो रही थी, जिनके पास जीने के लिए कुछ भी नहीं बचा था।

अपनी बीमारी के चरण सीमा पर नगुयेत वियतनाम स्थित अपने घर पर थी।

बीमारी के इलाज़ की कोशिश

वर्षों तक, नगुयेत अपने परिजनों के साथ इलाज ढ़ूंढ़ने के लिए विभिन्न स्थानों की यात्रा करती थी। जब पश्चिमी चिकित्सा के डॉक्टर उनका इलाज़ नहीं कर पाए, तब वह चीनी चिकित्सा के डॉक्टरों की तलाश में निकली। एक स्थान पर उन्हें एक महीने से भी अधिक समय तक रुकना पड़ता था। उन्होने कई पद्दतियों का इस्तेमाल किया, जैसे कि, मसाज, एक्यूप्रेशर, एक्यूपंचर, हर प्रकार की चीनी चिकित्सा। हालांकि इससे पहले वे धार्मिक नहीं थे, नगुयेत की मां हर रोज़ प्रार्थना करने लगी थी। लेकिन अंत में कुछ भी काम नहीं आया।

क्योंकि नगुयेत को प्रत्येक दिन अाक्षेपरोधी (anticonvulsants) लेनी होती थी, वह दवाइयों की आदी हो गई और जब कभी भी उनकी दवाइयां ख़त्म हो जाती तो वह घबरा जाती। हर बार जब उन्होने अाक्षेपरोधी की दवाइयां खरीदी, तो वे नींद की गोली की शीशी के साथ आते। नगुयेत ने आत्महत्या के बारे में सोचते हुए इन स्लीपिंग पिल्स को बचाना शुरु कर दिया। उन्हें बस डर और दोष की भावना ने रोक रखा था—ऐसा डर कि उनके परिजन इस झटके को झेल नहीं पाएंगे। वह उन्हें और भी पीड़ा देने वाले विचार को धारण नहीं कर सकी। किसान के रुप में अपने अल्प आय के बावजूद, उन्होंने अपने बचत का इस्तेमाल उनके तमाम उपचार में इस्तेमाल किया था। कृतज्ञता की उनकी भावना अपरिहार्य थी।

2014 में नगुयेत के छोटे से परिवार पर एक बहुत बड़ा दुःखों का पहाड़ टूट पड़ा। उनके पिता को अचानक से स्ट्रोक आया और उनकी मृत्यु हो गई, नगुयेत की बीमारी का खर्च और घर की वित्तिय जिम्मेदारियों का बोझ उनकी मां के कंधों पर आ गया। नगुयेत और उनका परिवार जिन दुःखों से जूझ रहे थे उनके दर्द और कमी की कोई सीमा नहीं थी।

महासागर में एक बॉय

इतने सालों तक बीमारी से लड़ते हुए नगुयेत स्थायी रुप से बहुत ही कमज़ोर हो गई थी। वह अक्सर शक्तिहीन महसूस करती थी और अपनी पीड़ा और तनाव को मात्र सिसक कर ही दूर कर सकती थी। वह समझ नहीं पा रही थी कि वह क्यों इतना ज्यादा जूझ रही है, और क्यों ईश्वर उन्हें मरने नहीं दे रहा।

बिल्कुल तनावग्रस्त स्थिति में नगुयेत को ऐसा महसूस होता था जैसे उनका सिर फटा जा रहा है। लेकिन एक दिन, उम्मीद की एक किरण जागी: उन्होने सुना कि पास की रहने वाली एक बुजुर्ग महिला जिनका नाम मिस. टीएप (Tiep) था, उन्होंने एक ऐसे अभ्यास का पता लगाया है जो कई बीमारियों को ठीक कर सकता है, और यह निःशुल्क है।

नगुयेत, मिस टीएप के घर पहुंची और गेट के पीछे छिप गई। उन्होने देखा कि अंदर लोग एक धीमी गति का व्ययाम कर रहे हैं। इस गति के साथ जो संगीत था वह बहुत ही मधुर और सुखदायक था, ऐसा महसूस हुआ जैसे बादलों की धुंध ने उनकी घायल आत्मा को अपनी लपेट में ले लिया हो, और उसे सहला रही हो।

कुछ दिनों बाद, उन्होने मिस. टिएप से मिलने और उनकी पद्दति के बारे में पूछने की हिम्मत जुटा ली। मिस. टिएप ने फालुन दाफा नाम के ध्यान अभ्यास के बारे में उन्हें कुछ जानकारी दी, और इसके बारे में ऑनलाइन जानकारी पाने के लिए आमंत्रित किया, और उसके बाद वापस आने को कहा ताकि वे अपना अभ्यास उनके साथ शुरु कर सकें।

फालुन गोंग के बारे में ऑनलाइन जो कहानियां थी उन्होंने नगुयेत को आश्चर्यचकित कर दिया, उन्हें इस अभ्यास को सीखने के लिए और भी प्रतिबद्ध कर दिया। कुछ दिनों बाद, वह अभ्यास स्थल पर मिस. टिएप के पीछे पीछे जाने के लिए काफी उत्साहित थी, जहां बहुत से लोग फालुन गोंग का अभ्यास कर रहे थे, जो अभ्यासी स्वयंसेवकों द्वारा शिक्षित किए जा रहे थे। नगुयेत ने झुआन फालुन (Zhuan Falun) नामक किताब किसी के पास से पढने के लिए ली, जिसमें अभ्यास और उसके नियमों के बारे में जानकारी दी गई थी। उसे पढ़ने के लिए वह देर रात तक जागी। आमतौर पर वह सुबह कमज़ोरी महसूस करती थी, लेकिन अगेल दिन उन्होने बहुत ही अद्भुत महसूस किया।

नगुयेत, फालुन दाफा का ध्यान अभ्यास करते हुए! (Dang Thi Nguyet)

फालुन गोंग का अभ्यास करने के बाद आए बदलाव

तब से नगुयेत को एक नई उम्मीद मिल गई। वह हर रोज़ अभ्यास स्थल पर जाती और अन्य अभ्यासियों के साथ झुआन फालुन पढ़ती। नगुयेत ने किताब को पढ़ा और कई बार उसे पढ़ा, हर बार जब वह किताब को खत्म करती एक नया क्षितिज और अर्थ उन्हें पता चलता। वह अपने दर्द, तनाव, और निराशा को दूर करने के लिए प्रेरित हुई।

झुआन फालुन  को कुछ दिन पढ़ने के बाद, नगुयेत के शरीर के साथ सिरदर्द, चक्कर और आक्षेप की बहुत ही गंभीर प्रतिकृयाएं हुई। लेकिन वह झुआन फालुन से यह समझ गई थी कि पहले की अवधि में समायोजन और सफाई के लिए यह शरीर के लिए सामान्य है। इस प्रकार नगुयेत चिंतित नहीं थी। धीरे-धीरे, प्रत्येक दिन, नगुयेत का शरीर और मस्तिष्क अत्यधिक तरोताज़ा और सहज हो रहा था।

नगुयेत ने अपने चरित्र में भी उन्नति देखी और जब वह कुछ गलत कर रही होती हैं तो उसे जानने की क्षमता भी पा ली थी। उन्होने मुझे यह कहानी बताई: एक दिन, उनकी मां खेत में कठिन परिश्रम कर देर से घर लौटी। वह बहुत भूखी और थकी हुई थी, लेकिन नगुयेत घर पर नहीं थी और उन्होंने भोजन नहीं बनाया था। जब नगुयेत घर आई तो उनकी मां ने घर के कामकाज़ में हाथ नहीं बटाने के लिए उन्हें बहुत भला-बुरा कहा। शांतिपूर्वक और सज्जनता से अपनी मां को ये बताने के बजाए कि वह अपनी बहन को उसकी बच्चों की देख-रेख में मदद कर रही थी, नेगुयेत चिढ़ गई और अपनी मां पर चिल्लाने लगी, और उनका अपमान करने लगी। इस बहस की वजह से उन्हें बहुत झटका लगा था और वह पूरी रात सो नहीं पाई थी।

नगुयेत जब उठी तो बहुत थकान महसूस कर रही थी। उन्हें चक्कर आ रहा था और दाहिने हाथ में दर्द हो रहा था। अचानक, उन्होने अपनी मां की आवाज़ सुनी, और उनकी आंखों से आंसू बहने लगे। उन्हें एहसास हुआ कि चुकि वह फालुन गोंग अभ्यासी है, उन्हें सत्य, करुणा और सहिष्णुता के सिद्धांतों पर अमल करना चाहिए, फिर भी अपनी मां के साथ उनका बर्ताव इस सिद्धांतों से काफी नीचे था। उन्हें पता था कि अब समय आ गया है कि उन्हें यह दिल की भड़ास निकालना और शिकायत करना ख़त्म करना होगा।

उन्हें यह भी याद आया कि फालुन गोंग लोगों को यह शिक्षा देता है कि कैसे उनकी क्रिया बिना कुछ किए दूसरों को प्रभावित करती है। इसने उन्हें यह सोचने के लिए मजबूर कर दिया कि कैसे उस दिन और हर दिन उनकी मां कठिन परिश्रम करती हैं। उन्हें हमेशा जल्दी उठना पड़ता है, देर तक काम करना पड़ता  है, और वे नगुयेता के लिए आधे पेट रह कर पैसे बचाती हैं। इसके अतिरिक्त, नगुयेत जब बीमार थी, तो सालों तक न जाने कितनी राते बिना सोए उनकी देखभाल करते गुजारी है। नेगुयेत को एहसास हुआ कि कैसे उनके क्रोध ने उन्हें कठोर और स्वार्थी बना दिया है।

इन सभी गलत विचारों को देखने के बाद, नगुयेत बदलाव के लिए प्रतिबद्ध हो गई। उस पल उनका शरीर हल्का महसूस कर रहा था और दिल पर कोई बोझ नहीं था। उस अनुभव ने उनकी बहुत मदद की कि कैसे सत्य, करुणा और सहिष्णुता के अनुसार इंसान एक अच्छा इंसान बन सकता है। नगुयेत ने कहा कि पालन करना मुश्किल नहीं है। यह तभी मुश्किल है जब आप अपनी नफरत और बुरी सोच को दूर नहीं कर पाते। कठिनाई इस पर निर्भर करती है कि दूसरों के साथ अपने रिश्तों में आप निःस्वार्थ, दया और क्षमादान करते हैं या नहीं।

Health & Happiness: A Whole New World

आज, नगुयेत पूरी तरह से बीमारी रहित हैं; वह बीमारी, दर्द और डर, जो उनके भीतर दबा हुआ था उससे  उबर चुकी है। आमतौर पर नगुयेत अपने आप एक कदम चलने से भी डरती थी। अब वह कहीं भी आत्मविश्वास के साथ जाती है और बिना थके मीलों तक स्कूटर या फिर बाइक चला सकती है। उनकी त्वचा जो कभी काली, रुखी और मुंहासों से भरी हुआ करती थी, ध्यान की वजह से अब साफ और चमकदार हो गई है।

हालांकि उनका दाहिना हाथ बाएं हाथ की तरह पूरी तरह से ठीक नहीं हुआ है, फिर भी दर्द गायब हो चुका है। नगुयेत ने कहा कि, “अब मेरा सिर दर्द नहीं होता, अब मुझे चक्कर भी नहीं आता, और अब मैं बहुत ही हल्का महसूस करती हूं। खतरनाक मरोड़ों की बात करें तो, वे सभी बिल्कुल हल्के और अब डराने वाला नहीं रह गए है। करीब एक साल से अब मैंने आक्षेपरोधी का इस्तेमाल करना बंद कर दिया है, जिनका इस्तेमाल मैं अपने जीवन के लिए करती थी। केवल फालुन गोंग का अभ्यास कर मैने अपनी हिम्मत दोबारा पाई है।”

साधारण, सामान्य व्यायाम और झुआन फालुन के निपुण सिद्धांतों ने नगुयेत के साहस को प्रबुद्ध किया है। और फालुन गोंग के सार्वभौम सिद्धांतों—सत्य, करुणा और सहनशीलता के पालन ने उनके व्यक्तित्व को बदल दिया है। वह अपने जीवन में प्रेरणा शक्ति से बेहतर बनने के लिए खुद में सुधार कर रही है।

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