जाववरों को पालने और उन्हें प्यार करने वालों की संख्या आज तेजी से बढ़ रही है। लेकिन ज्यादातर लोग उनके प्रति प्यार सिर्फ तभी तक दर्शाते हैं जब तक वे प्यारे और स्वस्थ्य रहते हैं। एक बार बीमार पड़ जाने या बूढ़े हो जाने के बाद वे उनसे नाता तोड़ लेते हैं। लेकिन कुछ लोग ऐसे होते हैं जो उनकी मृत्यु तक उनका साथ देते हैं फिर चाहे वो बीमार हों या चलने में असक्षम। उन्हीं में से एक हैं डॉ दीपा कात्याल जिन्होंने उन जानवरों के दर्द को देखते हुए पशुचिकित्सक बनने का फैसला किया।

बेटर इंडिया के अनुसार, एक अच्छे खासे अमीर व्यापारी परिवार से संबंध रखने के बावजूद दीपा ने पशुचिकित्सक को ही अपने करियर के लिए  चुना। इस सोच की शुरूआत उस वक्त से ही हो गयी थी जब उनके 8वें जन्मदिन पर उनके घरवालों ने उन्हें एक प्यारा कुत्ता तोहफे में दिया था। दीपा ने उसका नाम रॉकी रखा।

शुरूआत में रॉकी बेहद नकचढ़ा और गुस्से वाला था लेकिन दीपा ने उसे बड़े ही सूझबूझ और संयम के साथ संभाला। दोनों साथ-साथ बड़े हुए और उम्र की दहलीज पार की। जब दीपा 24 की हुईं और रॉकी 18 का तो रॉकी की मौत हो गई और यहीं से दीपा ने पशुचिकित्सक बनने की ठानी।

काम के दौरान दीपा को एक और कुत्ता तोहफे में मिला। दीपा को उसमें अपने पुराने कुत्ते रॉकी का अक्श नजर आया। अतः दीपा ने उसका नाम भी रॉकी रख दिया लेकिन कुछ साल बाद पता चला कि रॉकी को तो इंटरवर्टेब्रल डिस्क (inter vertebral disc) की बीमारी है। दीपा किसी भी तरह से रॉकी को दर्द मुक्त करना चाहती थीं लेकिन दर्द प्रबंधन विषय को भारतीय चिकित्सा पाठ्यक्रम में शामिल नहीं किये जाने की वजह के कारण उन्होंने ऑस्ट्रिया जाने का फैसला किया।

उन्होंने ऑस्ट्रिया की क्वींसलैंड विश्वविद्यालय में इसकी पढ़ाई की और फिर वापस आकर रॉकी का इलाज किया जिससे उसे उस दर्द से छुटकारा मिला। कुछ वर्षों के बाद रॉकी के पीछे के दोनों पैर लकवाग्रस्त हो गये। लेकिन दीपा ने हार नहीं मानी। उन्होंने विदेश से व्हील कार्ट मंगवाया और आवश्यकतानुसार उसमें बदलाव किया।

दीपा ने अपनी क्लिनिक खोली जिसमें वे कई प्रकार के जानवरों का इलाज करती हैं। उन्हें उम्मीद है कि स्वदेश में भी दर्द प्रबंधन को लेकर खास तौर पर क्लिनिक की स्थापना की जाएगी।

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