“देश की दुर्दशा निहारोगे,

डूबते को कभी उभारोगे।’

कुछ करोगे कि बस सदा रोकर,

दीन हो दैव को पुकारोगे।”

या फिर,

“शशि मुख पर घूँघट डाले अँचल में दीप छिपाये,

जीवन की गोधूली में कौतूहल से तुम आये।

मधुराका मुस्काती थी पहले देखा जब तुमको

परिचित-से जाने कब के तुम लगे उसी क्षण हमको।”

अगर आप साहित्य में रूची रखते हों तो आपको हिंदी साहित्य के कालजयी लेखक जयशंकर प्रसाद की कविताओं की ये पंक्तियाँ तो याद ही होंगी। आज ही के दिन छायावाद के सशक्त साक्षात्कार, नाट्य साहित्य के प्रबल प्रवर्तक, कहानी और उपन्यास के सर्जक महान लेखक जय शंकर प्रसाद जी की मृत्यु हुई थी। आज ही के दिन हिंदी साहित्य के एक चमकता हुए सितारे ने अपने भौतिक शरीर को त्यागा था। इनकी मृत्यु की क्षति की भरपाई हिंदी साहित्य कभी नहीं कर पाएगी। लेकिन इनके द्वारा लिखी गई कालजयी लेखनी आज भी पढ़ी जाती है, आज भी याद की जाती है। तो चलिए, आज के दिन अपने इस कालजयी लेखक को एक बार फिर से याद करते हैं।

1. जयशंकर प्रसाद हिंदी छायावादी युग के प्रमुख चार स्तंभों में से एक हैं। वे हिन्दी कवि, नाटककार कहानीकार, उपन्यासकार और निबंधकार थे।

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Credit: NavBharat Times Blog

2. नाटक लेखन में वे भारतेंदु हरिशचन्द के बाद एक अकेले कवि हैं जो युग प्रवर्तक कवि हुए। आज भी पाठकों को उनके द्वारा लिखे गए नाटकें खूब पसंद आते है।

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Credit: Quint Hindi

3. कविता में वे सुमित्रा नंदन पंत, निराला और महादेवी वर्मा के साथ छायावाद के प्रमुख स्तंभ के रूप में प्रतिष्ठित हैं। उनकी काव्य रचनाओं में “झरना,” “आँसू,” “लहर,” “कामायनी,” और “प्रेम-पथिक” सबसे ज्यादा प्रख्यात है।

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Credit: TV INDIA LIVE

4. प्रसाद जी का मानना था कि साहित्य साधना है न कि पैसे अर्जन करने का माध्यम। कामायनी के लेखन पर इन्हें “मंगलप्रसाद पारितोषक” से सम्मानित किया गया था। इन्होंने अपनी रचनाओं के माध्यम से कभी पैसे कमाने की चेष्टा नहीं की।

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Credit: PDF Books Mandir – blogger

5. जयशंकर प्रसाद ने अपनी प्रारंभिक पढ़ाई काशी के क्वींस कॉलेज से की। युवावस्था से पहले ही माता और बड़े भाई का देहावसान हो गया जिसके बाद तो इन पर जैसे मुसिबतों का पहाड़ सा टूट पड़ा। लेकिन इन्होंने इन सबका सामना बड़े ही धीरता और गंभीरता से किया।

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Credit: Jaishankar Prasad Nyas

6. जब ये नौ वर्ष के थे तभी ही इन्होंने  “कलाधर” के नाम से सवैया लिखकर रसमय सिद्ध को दिखा दिया था।

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Credit: Kahaniya.com

7. प्रसाद ने अपनी काव्य रचना की शुरूआत ब्रजभाषा से की और फिर काव्य में खड़ी बोली को ले आए। खड़ी बोली में इन्होंने इस कदर काम किया कि उनकी गिनती इस भाषा के प्रसिद्ध कवियों में की जाने लगी।

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8. उनकी सर्वप्रथम छायावादी रचना “खोलो द्वार” वर्ष 1914 में इंदु में प्रकाशित हुई। इनकी काव्य रचनाएँ “कानन कुसुम”, “महाराणा का महत्व”, “झरना”, “आंसू”, “लहर”, “कामायनी”, “प्रेम पथिक” हैं।

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Credit: Kalpri Online Art Gallery

9. प्रसाद ने कुल 13 नाटकों का सर्जन किया है, जिसमें दो भावनात्मक, तीन पौराणिक और आठ ऐतिहासिक है। इनके नाटकों में “स्कंदगुप्त”, “चंद्रगुप्त”, “ध्रुवस्वामिनी”, “जन्मेजय का नाग यज्ञ”, “राज्यश्री”, “कामना”, “एक घूंट”, आदि हैं।

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10. इनकी कहानी संग्रह में “छाया”, “प्रतिध्वनि”, “आकाशदीप”, “आंधी”, “इन्द्रजाल” और उपन्यास में “कंकाल तितली” और “इरावती” है।

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